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रविवार, 31 जनवरी 2021
प्रभु सिमरन की वेला
शनिवार, 30 जनवरी 2021
नर सेवा नारायण सेवा
शीर्षक- नर सेवा नारायण सेवा
# विधा - स्वैच्छिक
नर सेवा नारायण सेवा
"सेवा परमो धर्म:" सेवा सबसे बड़ा धर्म है । हमारा भारत देश नर सेवा नारायण सेवा के सिद्धांत को मानता है हमारे ऋषियों, मुनियों, अवतारों ने अपनी पावन पवित्र वाणी में मानव सेवा को सर्वोपरि माना है। सेवा निष्काम भाव से करनी चाहिए। सेवा का आरंभ हमारे स्वयं गृह से होता है माता-पिता, पत्नी और बच्चों की सेवा आदि।
जब सेवा का दायरा घर की दहलीज को पार कर समाज की ओर बढ़ता है तब उसे मानवता की सेवा कहा जाता है। जिसमें हम अपना तन ,मन ,धन सब सेवा में अर्पण करते हैं। सेवा करने से हमारा मन स्वच्छ और निर्मल होता है।
हमारे अंतर्मन में प्रेम भावना ओत प्रोत हो जाती है हमें सब में ईश्वर की ज्योति नजर आती है।सेवा का फल हमें तभी मिलेगा जब हम सेवा निष्काम भाव से और अहंकार से रहित होकर करेंगे। सेवा करते समय जात-पात, धर्म, वर्ण, रंग, रूप में आदि का भेद भाव नहीं होना चाहिए बल्कि सभी मनुष्यों से समभाव रखना चाहिए। दूसरों की भलाई के लिए प्राण न्यौछावर करने तक तत्पर रहना चाहिए।
अपनी योग्यता के अनुसार हर एक जरूरतम मनुष्यों की सहायता करनी चाहिए।
निष्काम भाव से की गई सेवा हमारे लिए बैकुंठ धाम के कपाट खोल देती है इस संसार में और ईश्वर के द्वार में सर्वोच्च स्थान प्राप्त होता है।हर किसी जरूरतमंद मनुष्य की सहायता के लिए हमें हमेशा तत्पर रहना चाहिए कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। सेवा हर एक मनुष्य नहीं कर सकता यह तो ईश्वर द्वारा चयनित कुछ ही लोग कर सकते हैं जिन्हें ईश्वर इसके योग्य मानता है। सेवा करने से हमें जो आनंद प्राप्त होता है उसे मापा नहीं जा सकता है मानवता प्रेम से करना और ईश्वर से प्रेम करने के समान है।
शुक्रवार, 29 जनवरी 2021
बनना है तो इंसान बनो
कविता - बनना है तो इंसान बनो
गुरुवार, 28 जनवरी 2021
प्रभु चरनन की प्रीत
कविता - प्रभु चरनन की प्रीत
बुधवार, 27 जनवरी 2021
पक्षी बन उड़ जाऊं
कविता - पक्षी बन उड़ जाऊं
मंगलवार, 26 जनवरी 2021
हिंसा राह नहीं है अपने हक लेने का
कविता
हिंसा राह नहीं है अपने हक लेने का
सोमवार, 25 जनवरी 2021
संसार मुसाफिर खाना है
कविता - संसार मुसाफिर खाना है
सिमरन करना क्यों जरूरी है ?
#विषय- सिमरन/जप
#विधा - आलेख
जो सुख में सिमरन करे दुःख काहे को होय।"
भक्त कबीरदासजी
रविवार, 24 जनवरी 2021
अन्नदाता की पुकार
कविता - अन्नदाता की पुकार
शुक्रवार, 22 जनवरी 2021
गोरों से लड़ा हूं मैं - कविता
कविता - गोरों से लड़ा हूं मैं
गुरुवार, 21 जनवरी 2021
मैं हिन्द का किसान हूं
नमन मंच 🙏🙏🙏🙏🙏🙏
#हिंददेश परिवार उड़ीसा इकाई
बुधवार, 20 जनवरी 2021
विनम्रता हमारी पहचान है
नमन मंच 🙏🙏🙏
#हिंददेश परिवार फरुखाबाद इकाई
दिनांक - 08/07/2021
दिन- गुरुवार
#विषय - विनम्रता की भावना
विधा - गद्य - पद्य (आलेख)
शीर्षक - विनम्रता हमारी पहचान है
"झुकता तो वहीं है जिसमें जान होती है,
अकड़ना तो मुर्दों की पहचान होती है।"
विनम्रता सबसे बड़ा गुण है जिस मनुष्य में यह गुण है वे बहुत भाग्यशाली हैं। विनम्र व्यक्ति का सभी सम्मान करते हैं क्योंकि वे धन और किसी विशेष गुण का अहंकार नहीं रखता है।
रहीम जी कहते है-
"छिमा बडेन को चाहिए,छोटन को उत्पात।
का रहिमन हरि को घट्यो,जो भृगु मारी लात।"
इस दोहे में रहीम जी कहते हैं कि अगर कोई अभद्र व्यक्ति अभद्रता से बात करें तो भद्र पुरुष को उस व्यक्ति को क्षमा कर देना चाहिए और विनम्रता से उसके साथ बात करनी चाहिए। आगे रहीम जी कहते हैं कि कोई बात नहीं अगर ॠषि भृगु ने भगवान विष्णु को लात मार दी क्या इससे उनका कुछ घट गया। उल्टा ॠषि भृगु उनकी विनम्रता देखकर नमस्तक हुए । हमारे धार्मिक ग्रंथों में विनम्रता को श्रेष्ठ और उत्तम गुण माना गया है ।
विनम्र और अहंकारी व्यक्ति को समझने के लिए यह उदाहरण कारगर साबित होगा। अंहकारी व्यक्ति उस खाली बर्तन की तरह है जिसमें कुछ कंकर भर दिए जाए तो थोड़ा सा हिलने पर भी आवाज करता है। विनम्र व्यक्ति उस भरें हुए बर्तन की तरह है जो अपने गुणों को अपने अंदर समेट कर रखता है और उसका दिखावा नहीं करता है।जब तूफान आता है जो पेड़ सीधे खड़े रहते हैं हवा उनको जड़ों से उखाड़ कर फेंक देती है ,जो पेड़ झुक जाते हैं वे उखड़ने और टूटने से अपने आप को बचा लेते हैं। विनम्रता कमजोरी की निशानी नहीं है यह निशानी है व्यक्ति के परिपूर्ण होने की।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू
मंगलवार, 19 जनवरी 2021
समय का मोल - कविता
# नमन मंच 🙏🙏🙏
#हिंददेश परिवार दिल्ली इकाई
# दिनांक - 14/05/2021
# दिन - शुक्रवार
# विषय- समय
# विधा - स्वैच्छिक
सोमवार, 18 जनवरी 2021
खोज अपने आप की - लेख
लेख - खोज अपने आप की
"बंदे खोज दिल हर रोज ना फिर परेसानी माहि।"( भक्त कबीरदास जी महाराज)
रविवार, 17 जनवरी 2021
जीवन बहती जलधारा है - कविता
कविता - जीवन बहती जलधारा है
शनिवार, 16 जनवरी 2021
यह मार्ग कठिन है पथिक - कविता
शुक्रवार, 15 जनवरी 2021
गुरु बिन घोर अंधियारा - लेख
# नमन मंच 🙏🙏🙏
#हिंददेश परिवार उतराखंड इकाई
# दिनांक - 24/04/2021
# दिन - शनिवार
# विषय - गुरु महिमा
# विधा - गद्य - पद्य
गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः
गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुर को प्रणाम ।इस संस्कृत श्लोक के अनुसार गुरु का स्थान ब्रह्माण्ड में सबसे ऊंचा है।
गुरु शब्द दो शब्दों के मेल से बना है गु और रु ।गु शब्द का अर्थ है अंधकार, अंधेरा या अज्ञान और रु का अर्थ है प्रकाश, रोशनी या ज्ञान।जो हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है उसे हम गुरु कहते हैं। हमारे संतों, महापुरुषों ने अपनी वाणी में गुरु को ईश्वर से बड़ा बताया है। भक्त कबीर दास जी कहते हैं कि
गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताए
वे कहते है कि गुरू और गोबिंद एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को? ऐसी स्थिति में गुरू के चरणो कमलों में शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनके अनुसार गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती है।
गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।
गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।( भक्त कबीरदास जी)
गुरु के बिना हमें ज्ञान नहीं मिल सकता है क्योंकि ज्ञान के बिना ईश्वर प्राप्ति नहीं होती है। गुरु ज्ञान के बिना हमें सत्य असत्य का ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर ही हम ईश्वर का साक्षात्कार कर सकते हैं। गुरु हमें शारीरिक बंधनों से मुक्त करवाकर आति्मक सुख प्रदान करता है। गुरु भ्रम और मायाजाल में फंसे हुए जीवों को मुक्ति प्रदान करता है संसारिक मोह-माया में फंसे हुए जीवों को सत्य का ज्ञान गुरु द्वारा ही होता है गुरु के ज्ञान के बिना मानव जीवन व्यर्थ ही व्यतीत होता है क्योंकि मनुष्य की अज्ञानता उसे जीवन का लक्ष्य समझने ही नहीं देती।मानव जीवन के प्रयोजन को समझने के लिए गुरु का होना परमावश्यक है। गुरु के समस्त गुणों को लिख पाना असम्भव है क्योंकि गुरु की महिमा अपरम्पार है जिसके लिए भक्त कबीरदास जी कहते है कि -
सब धरती कागज करूँ,लिखनी सब बनराय |
सात समुद्र की मसि करूँ,गुरु गुण लिखा न जाय ||
वे कहते है कि सब पृथ्वी को कागज, सब जंगल को कलम, सातों समुद्रों को स्याही बनाकर लिखने पर भी गुरु के गुण नहीं लिखे जा सकते |
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू, जम्मू कश्मीर
गुरुवार, 14 जनवरी 2021
लेख - इंसानियत की पहचान क्या है?
सबसे पहले हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि इन्सान कौन है, उसके अंदर कौन से गुण होने चाहिए। प्रथम जिस मनुष्य के हृदय में दया की भावना विद्यमान है वहीं इन्सान कहलाने का अधिकारी है।जब हम किसी दुःख देखकर दुखी हो, किसी का सुख देखकर सुखी हो। इससे हमें यह ज्ञात होगा कि हम इंसानियत सीख रहे है।जब हमारी दया धर्म,जाति, देश से ऊपर उठ जाती हैं तब हम इंसानियत के गौरव प्राप्त कर लेते है।
दया धर्म का मूल है
मंगलवार, 12 जनवरी 2021
धरती मां की गोद में - कविता
# विषय - धरती माता की गोद में
# विधा - स्वैच्छिक
धरती मां की गोद में ,
मिलते सुख अनंत,
कण-कण में ममता भरी ,
हरे हरे वृक्षो की हवा ,
लगती मां के कोमल हाथों जैसी ,
तेरी गोद में कोई भेद भाव नहीं,
जाति, रंग, धर्म का,
तेरे पर्वतों की छाया में,
दुलार मां के प्रेम जैसा,
नदियों की निर्मल धारा ,
अमृत रस है सारा ,
खेत खलिहानों में ,
दिखता तेरा अन्नपूर्णा रूप,
धरती मां तेरी गोद में ,
मिलते सुख अनंत।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू, जम्मू कश्मीर
लेख- जैसी संगत वैसी रंगत
नमन मंच 🙏🙏🙏
#हिंददेश परिवार अमेरिका इकाई
दिनांक - 27 जून 2021 से 03जुलाई, 2021
दिन - रविवार से शनिवार
#विषय - संगत की रंगत
विधा - गद्य - पद्म
लेख- जैसी संगत वैसी रंगत
"कबीर मन पंखी भइओ उड़ उड़ दह दिस जाइ।जैसी संगत मिलै सो तैसो फल खाई।"
भक्त कबीरदास जी का यह दोहा संगति का महत्व प्रकट करता है। इस दोहे में भक्त कबीर दास जी ने मन की तुलना पक्षी से की है जो दस दिशाओं में घूमता रहता है।वह कहते हैं कि मनुष्य जैसी संगति करेगा उसी के अनुसार फल फल भी भुगतेगा। मनुष्य चरित्र के निर्माण संगति के अनुसार होता है उसकी संगति ही उसे अच्छा या बुरा बनाती है।साधु संतों की संगति उसे ईश्वरीय गुणों से भरपूर कर देती है। उसका अंतर में दया, संतोष, प्रेम,क्षमा, विनम्रता, सेवा, समर्पण, त्याग की भावना उत्पन्न होती है। सज्जन पुरुषों की संगति सही या ग़लत का निर्णय करने में सहायक सिद्ध होती है। दुर्जनों की संगति मनुष्य को विनाश की ओर ले जाती है और उसके अंतर में विनाशकारी गुणों को उत्पन्न करती है।बुरी संगति के प्रभाव के कारण हम घृणित कार्य करने में भी आनंद अनुभव करते हैं। क्योंकि हमारे हृदय में विकारों की मैल जम जाती है। विकारों की मैल हमारी बुद्धि और विवेक को शून्य कर देती है। अतः हमें संगति का चयन उसके परिणाम को सामने रखकर करना चाहिए।
अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू
सोमवार, 11 जनवरी 2021
कृपानिधि अब तो कृपा कीजिए
कविता - कृपानिधि अब तो कृपा कीजे
कृपानिधि अब तो कृपा कीजे
मेरे अवगुणों को बख्श लीजे
तुम्हारी शरण मैं मांगू दिन रात
मोहे राखो देकर हाथ।
कृपासिंधु दीन दयालु
अपने जन पर सदा कृपालु
तेरे नाम दुख तोडनहार
मिट गया अज्ञान अंधियारा।
मैं अवगुण भरी तोहे पुकारा
मोहे नारायण एक सहारा
डूबत जन की लाज रखीजै
नाम अपने की टेक दीजै।
नाम अपने का जाप जपीजै
अपर अपार दर्शन दीजै
तेरा दर्शन जन्म मरण का दुख मिटावै
मन की सगल मैल गवावै।
अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर , जम्मू
गुरुवार, 7 जनवरी 2021
जंग पर संकट
विश्वास ही भक्ति है
भक्ति का आरंभ ही विश्वास से होता है। विश्वास को उत्पन्न करने का माध्यम है हमारी श्रद्धा, श्रद्धा उत्पन्न होती है प्रेम से। भक्ति नाम है समर्पण का।समर्पण अपनी इच्छाओं और मनोकामनाओं का,जो नित्य हमारे हृदय में विद्यमान रहती हैं। भक्ति मार्ग विश्वास का मार्ग है। इसमें विश्वास ही साधक को ईश्वर से मिलाता है। साधक का विश्वास ही उसे इष्ट से मिलाता है। भक्ति मार्ग में साधक को ईश्वर के सर्वगुण और सर्वशक्तिमान होने पर विश्वास होना चाहिए।उसको ईश्वर को सर्वव्यापी मानकर भक्ति करनी चाहिए।हर एक वस्तु में ईश्वर को महसूस करना चाहिए।जब साधक हर एक वस्तु में ईश्वर को महसूस करता है उसकी निकटता परमेश्वर के साथ बढ़ती जाती है।उसका हर एक कार्य धर्म परायण हो जाता है जिससे संसार को आनंद मिलता है। सुखी संसार से साधक को शुभ आशीष मिलती है।नर सेवा नारायण सेवा का मार्ग साधक को अपनाना चाहिए। समाज सेवा की भावना मन को निर्मल करती है और निर्मल मन में भक्ति जल्दी प्रफुल्लित होती है।
प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है
शीर्षक: प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है सभी ग्रंथों का सार सभी एक है परिवार बना ले इसको जीवन का आ...
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शीर्षक - पेड़ से गिरता पत्ता पेड़ से गिरता पत्ता दे रहा संदेश , जिस जग को तूने अपना मान लिया ,वो है पराया देश। सब से प्रीत लगा रहा , जो ...
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शीर्षक - शहीदों के सिरताज गुरु अर्जुन देव को नित नित शीश झुकाता हूं महिमा उनकी दिल से गाता हूं माता भानी के लाल की शहीदी गाथा सुनाता हूं...
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शीर्षक - चलो आज हम आशावादी बनते हैं जीवन के कठिन मार्ग पर चल कर जिंदगी की मुश्किलों का कुछ हल करते हैं निराशा भरे मन को उत्साहित कर हर मु...