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रविवार, 31 जनवरी 2021

प्रभु सिमरन की वेला

 कविता - प्रभु सिमरन की वेला

मानस जन्म प्रभु सिमरन की वेला
इस जग में सब कोई अकेला
सिमरन बिना नहीं कोई उतरा पार 
मन इस तथ्य को सोच विचार
प्रभु सिमरन में मिले कोटि आनंद
हृदय प्रगट भए परमानंद
मानस जन्म का यही लाभ
प्रभु सिमरन से होय उदार
सिमरन की कीमत किसी विरले जानी
जिन अनुभव किया हो प्रभु ध्यानी
मानव जन्म में ही सिमरिया जाया
रे मन तूं अवसर क्यों गंवाए
सिमरन से हो तूं अंतर्मुखी 
तृष्णा अग्न मन की बुझी
प्रभु प्रेम की यही निशानी
मैं मेरी की मिट्टी गुमानी
प्रेम भक्ति का यही सार
सब में दिखे दीन दयाल
प्रभु दर्शन से जन्म मरण मिट जाए
सब सुख हरि चरनन में पाएं।

अमरजीत सिंह
जम्मू कश्मीर, जम्मू
https://dhangurunanak1313.blogspot.com
 

शनिवार, 30 जनवरी 2021

नर सेवा नारायण सेवा

शीर्षक- नर सेवा नारायण सेवा

# विधा - स्वैच्छिक

 नर सेवा नारायण सेवा

"सेवा परमो धर्म:" सेवा सबसे बड़ा धर्म है । हमारा भारत देश नर सेवा नारायण सेवा के सिद्धांत को मानता है हमारे ऋषियों, मुनियों, अवतारों ने अपनी पावन पवित्र वाणी में मानव सेवा को सर्वोपरि माना है। सेवा निष्काम भाव से करनी चाहिए। सेवा का आरंभ हमारे स्वयं गृह से होता है माता-पिता, पत्नी और बच्चों की सेवा आदि।
जब सेवा का दायरा घर की दहलीज को पार कर समाज की ओर बढ़ता है तब उसे मानवता की सेवा कहा जाता है। जिसमें हम अपना तन ,मन ,धन सब सेवा में अर्पण करते हैं। सेवा करने से हमारा मन स्वच्छ और निर्मल होता है।
हमारे अंतर्मन में प्रेम भावना ओत प्रोत हो जाती है हमें सब में ईश्वर की ज्योति नजर आती है।सेवा का फल हमें तभी मिलेगा जब हम सेवा निष्काम भाव से और अहंकार से रहित होकर करेंगे। सेवा करते समय जात-पात, धर्म, वर्ण, रंग, रूप में आदि का भेद भाव नहीं होना चाहिए बल्कि सभी मनुष्यों से समभाव रखना चाहिए। दूसरों की भलाई के लिए प्राण न्यौछावर करने तक तत्पर रहना चाहिए।
अपनी योग्यता के अनुसार हर एक जरूरतम मनुष्यों की सहायता करनी चाहिए।
निष्काम भाव से की गई सेवा हमारे लिए बैकुंठ धाम के कपाट खोल देती है इस संसार में और ईश्वर के द्वार में सर्वोच्च स्थान प्राप्त होता है।हर किसी जरूरतमंद मनुष्य की सहायता के लिए हमें हमेशा तत्पर रहना चाहिए कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। सेवा  हर एक मनुष्य नहीं कर सकता यह तो ईश्वर द्वारा चयनित कुछ ही लोग कर सकते हैं जिन्हें ईश्वर इसके योग्य मानता है। सेवा करने से हमें जो आनंद प्राप्त होता है उसे मापा नहीं जा सकता है मानवता प्रेम से करना और ईश्वर से प्रेम करने के समान है।


स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू कश्मीर ,जम्मू

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

बनना है तो इंसान बनो

 कविता - बनना है तो इंसान बनो

बनना है तो इंसान बनो
जीवन में अच्छा काम करो
अवगुणों को हमेशा भगाएं रखो
गुणों को हमेशा जगाएं रखो
इंसान तो सभी कहलाते हैं
इंसानियत किसी विरले में होती है
दया को बनाओं गहना 
सीखों सब से मिलकर रहना
दिल में रखो सभी करूणा
हर परिस्थिति से है लड़ना
जीवन में कर्म ही प्रधान रहा है
कर्म ही जी ज़हान रहा है
जाति कुल से कोई महान नहीं बनता है
सदा कर्म ही जाति को महान बनाता है
प्रेम पुरुष की तूं ही संतान है
क्यों बन‌ गया शैतान है
अपना अस्तित्व भूल गया
अज्ञान की अग्नि में जल गया
जिसने अपना अस्तित्व जान लिया
मानव जीवन का आनंद मान लिया।


अमरजीत सिंह
जम्मू कश्मीर, जम्मू

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

प्रभु चरनन की प्रीत

  कविता - प्रभु चरनन की प्रीत

मीठी मीठी रे प्रभु चरनन की प्रीत
तिस पर वार दूं तीन लोक का राज
प्रभु के चरण दीन का आसरा
मन से मिट गया भ्रम का जाला
जब से भए दयाल प्रभु 
मोहे न मोही माया
दीन की प्रतिपाल करें 
सब दुष्टों का संहार करो
प्रभु के चरण कमलों करो नमस्कार
मिट जाएंगे सब रोग तुहार
तेरे चरणों में बैकुंठ धाम
तेरे ऊपर जाऊं कुर्बान
जो मांगा छिन में पाया
तेरी शरण में सकल सुख पाया 
देव देवी सब तुझे धयावै
तब ही जग में पूजे जावै
तेरे चरणों की महिमा अपरम्पार
तूं ही प्रभु सच्चा निरंकार
कलयुग में तेरा नाम तारणहार
सब ओर दिखता प्रभु निरंकार
प्रभु मोहे किछ कृपा कीजै
अपने चरनन की प्रीत लगीजै।

अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू

बुधवार, 27 जनवरी 2021

पक्षी बन उड़ जाऊं

     कविता - पक्षी बन उड़ जाऊं

मन करता है पक्षी बन उड़ जाऊं
सरहदों की दीवार हटाऊ
सब को मिलकर गले लगाऊं
धर्म देश का दिल से भेद भाव हटाऊ 
सब में प्रेम भाव बांटता जाऊं
नफ़रत को हृदय से मिटाऊं
सब को मिलकर रहना सिखाऊं
प्रेम प्रीत की राह बताऊं
बैर विरोध को जीवन से भगाऊ
कण कण में जो बसता है
उसी का इनको राह बताऊं
इंसान जिस भ्रम में जी रहा है
एक दूसरे का लहू पी रहा है
सब को जीवन का असली उद्देश्य बताऊं
सब ग्रंथों का सार सुनाऊं
सब के अंदर जो प्रीतम बैठा
तिस की बात बताऊं
जो तूं अंधकार में बैठा
अंदर तेरे ज्ञान का दीप जलाऊं।

अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

हिंसा राह नहीं है अपने हक लेने का

                    कविता


हिंसा राह नहीं है अपने हक लेने का


हिंसा राह नहीं है अपने हक लेने का
यह अपनों को ही नुकसान पहुंचती
हक लेने के लिए लड़ना पड़ता है
शांति का पाठ पढ़ना पड़ता है
हिंसा राह नहीं है अपने हक लेने का।

राष्ट्र ध्वज का सम्मान करो
बार बार सलाम करो
जब बन आये इसकी आन शान पर 
इसके लिए जान कुर्बान करो
देश को प्रगति की ओर ले जाना है
अपना कर्तव्य निभाना है
हिंसा राह नहीं है अपने हक लेने का

संविधान की गरिमा बनाए रखें
दिल में देशभक्ति जगाएं रखें
हम हैं अहिंसा के पुजारी 
हिंसा नहीं है हमें प्यारी
हिंसा राह नहीं है अपने हक लेने का।

राष्ट्र विरोधी ताकतों से बचना हमारा काम है
राष्ट्र सेवा ही हमारा काम है
हम सब एक हैं यही हमारा नारा है
भारत देश हमें प्राणों से भी प्यारा है
हिंसा राह नहीं है अपने हक लेने का।

अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू



सोमवार, 25 जनवरी 2021

संसार मुसाफिर खाना है

  कविता - संसार मुसाफिर खाना है

  संसार मुसाफिर खाना है
  एक ने आना एक ने जाना है
   यह तो रैन बसेरा है
   तूं कहे सब कुछ मेरा है।
    
    झूठी शान मान की खातिर 
    अनेक पापा कमाता है
     धन संचित करने में व्यस्त
      अपना धर्म गंवाता है।

    मोह माया के जाल में फंसकर
    अच्छे बुरे कर्म कमाता
  जिन कर्मो को करने से बचना था
  उनमें रूचि दिखाता है।

अंत  समय जब तेरा आया
अब क्यों चिल्लता है
जो तूं साथ लेकर आया था
वो भी तूने गंवाया है।

अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू

 
        

सिमरन करना क्यों जरूरी है ?

#विषय- सिमरन/जप

#विधा - आलेख

" दुःख में सिमरन सब करे सुख में करै न कोय
  जो सुख में सिमरन करे दुःख काहे को होय।" 
                                  भक्त कबीरदासजी

सिमरन का शाब्दिक अर्थ है याद करना। हमें किसी चीज को याद रखने के लिए उस चीज को दोहराना पड़ता है दोहराने की इस क्रिया को ही सिमरन कहा जाता है। परमपिता परमेश्वर को याद करने के लिए जिस शब्द का हम अभ्यास करते हैं इस क्रिया को सिमरन या स्मरण कहा जाता है।
परमपिता परमात्मा का सिमरन करने से हमारी आत्मा पवित्र और पावन होती है और परमेश्वर का साक्षात्कार प्राप्त करते है।सिख धर्म के पांचवें सद्गुरू श्री गुरु अर्जन देव जी महाराज अपनी पावन पवित्र वाणी में कहते हैं -
" प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा।"
उन्होंने अपनी पावन पवित्र वाणी में सिमरन को सब कर्म काण्डों से श्रेष्ठ माना है।प्रभु सिमरन से हमारे अंतर्मन की मैल धुल जाती है। प्रभु के नाम का सिमरन हमें आठों पहर करना चाहिए लेकिन जब हम प्रातः काल ब्रहम मुहूर्त में सिमरन करेंगे तो हमें काफी शांति मिलेगी ‌। सिमरन द्वारा हमें सृष्टि के बहुत सारे भेदों का ज्ञान प्राप्त होता है। हमें अपने जीवन का ज्ञान प्राप्त होगा कि हम किस उद्देश्य के लिए इस संसार में आए हैं ईश्वर ने हमें धरती पर किस कार्य को पूरा करने के लिए भेजा है।
सिमरन के द्वारा हमें अपने गुणों अवगुणों का ज्ञान प्राप्त होता है।जब हम सिमरन में बैठेंगे तो हमारे अच्छे या बुरे कार्य हमारी आंखों के सामने आ जाएंगेे। इस से हमारा अंतर्मन पवित्र और पावन होता है। सिमरन करना बहुत जरूरी है इसके बिना हम ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। हमारे संतों,महापुरुषों, अवतारों ने अपनी पावन पवित्र वाणियों हमें सिमरन वाला जीवन जीने का उपदेश दिया है।
मानव जीवन मात्र एक उद्देश्य है प्रभु नाम का सिमरन करना। गुरु अर्जुन देव जी महाराज कहते हैं कि मनुष्य को यह देही सिर्फ ईश्वर से मिलने के लिए मिली है अगर हम इस संसार में अनेक कार्य भी कर लें वो हमारे किसी काम नहीं आयेंगे। हमें करना क्या है हमें साधुसंगति में बैठकर ईश्वर का नाम स्मरण करना। सिमरन के द्वारा ही हम अनहद नाद को सुन सकते है जो निरंतर हमारे अंतर में गूंज रहा  है और इस नाद में सुरति जोड़ना हमारा मनुष्य जन्म का लक्ष्य है। वे कहते हैं - 
" भई परापति मानुख देहुरीआ।
गोविंद मिलण की इह तेरी बरीआ।
अवरि काज तेरै कितै न काम।
मिलु साध संगति भजु केवल नाम।
                   ( आसा महला ५) 

स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह 
जम्मू-कश्मीर, जम्मू







रविवार, 24 जनवरी 2021

अन्नदाता की पुकार

      कविता - अन्नदाता की पुकार

मैंने कई धूपों को झेला है
मुझे न समझो अकेला है
अपने हक़ के लिए लडूंगा मैं
नहीं तो यहीं मरूंगा मैं
अन्नदाता की पुकार सुन ले सरकार।

मुझे ऐसे ही नहीं अन्नदाता कहता संसार
फसल पैदा करने के लिए झेलता हूं कष्ट अपार
मैं तेरे आगे नहीं झुकने वाला
मैं हूं बहुत हिम्मतवाला
अपने पाने के लिए हूं मतवाला
अन्नदाता की पुकार सुन ले सरकार।

मैं बंजर भूमि को हरा भरा बना देता हूं
फसल को सींचने के लिए 
खून पसीना बहा देता हूं
मैंने उल्टा दिए तख्त अपार
अब न हो तेरी बार
अन्नदाता की पुकार सुन ले सरकार।

काले कानून वापिस लेने होंगे
फसलों के सही मूल्य देने होंगे
अब नहीं मैं पीछे हटने वाला
अड़ा रहा हूं हक़ के लिए हर बार
अन्नदाता की पुकार सुन ले सरकार।

अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू
 

 

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

गोरों से लड़ा हूं मैं - कविता

 कविता -     गोरों से लड़ा हूं मैं

गोरों से लड़ हूं मैं
अपने हक़ के लिए दी है अनेक कुर्बानियां 
मेरे बलिदान की अनेक कहानियां
भारत का किसान हूं मैं।

दूसरों को जीवन देने के लिए 
भूखा प्यासा काम करता है
अपनी नहीं परवाह मुझे
मैं देश के लिए जीता मरता हूं मैं
मभारत का किसान हूं मैं।

सरहदों पर जो खड़ा
वो मेरा ही हम हम साया है
देश के लिए कुर्बान होने
मैंने ही उसे सिखाया है
भारत का किसान हूं मैं।

अपने हकों को लेना मुझे आता है
मैं हिंसा नहीं अहिंसा पर विश्वास रखता हूं
गूंगे बहरे कानों में
अपनी आवाज सुनाने का प्रयास करता हूं
भारत का किसान हूं मैं।
ठंड, गर्मी की परवाह नहीं मुझे 
सहता कई सदियों से आया हूं मैं
देशवासियों का पेट भरने के लिए
जी तोड़ मेहनत करता हूं मैं
भारत का किसान हूं मैं।

अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू




गुरुवार, 21 जनवरी 2021

मैं हिन्द का किसान हूं

 नमन मंच 🙏🙏🙏🙏🙏🙏

 #हिंददेश परिवार उड़ीसा इकाई

दिनांक -  28/06/2021
विषय- भारतीय किसान
विधा -छंदमुक्त कविता

मैं हिन्द का किसान हूं
हर मौसम में लड़ता हूं 
कभी हथियार नहीं नीचे रखता हूं
तभी तो सोने जैसी फसल पैदा करता हूं
मैं हिन्द का किसान हूं।

खून पसीने से धरती सींचता हूं
सदा हिम्मत रखता हूं
मेरा देश अन्न भंडार से भरा रहे
तभी तो इतनी मेहनत करता हूं
मैं हिन्द का किसान हूं

मैं जात पात को नहीं मानता हूं
मेहनत ही मेरा धर्म है ये ही मेरा कर्म है
मैं सभी की भूख मिटाने के लिए
खुद भूखा प्यासा काम करता हूं
मैं हिन्द का किसान हूं।

मेरे देश मैं सिर्फ तुझे से 
अपना हक़ ही मांगता हूं
मैं किसी के हाथ की कठपुतली ना बन जाऊं
देश से न्याय मांगता हूं
मैं हिन्द का किसान हूं।

अमरजीत सिंह 
जम्मू-कश्मीर, जम्मू


बुधवार, 20 जनवरी 2021

विनम्रता हमारी पहचान है

 नमन मंच 🙏🙏🙏

#हिंददेश परिवार फरुखाबाद इकाई

 दिनांक - 08/07/2021

दिन-  गुरुवार

#विषय - विनम्रता की भावना

 विधा - गद्य - पद्य (आलेख) 

 शीर्षक -  विनम्रता हमारी पहचान है

"झुकता तो वहीं है जिसमें जान होती है,

अकड़ना तो मुर्दों की पहचान होती है।"


विनम्रता सबसे बड़ा गुण है जिस मनुष्य में यह गुण है वे बहुत भाग्यशाली हैं। विनम्र व्यक्ति का सभी सम्मान करते हैं क्योंकि वे धन और किसी विशेष गुण का अहंकार नहीं रखता है।

रहीम जी कहते है-

"छिमा बडेन को चाहिए,छोटन को उत्पात।
का रहिमन हरि को घट्यो,जो भृगु मारी लात।"

इस दोहे में रहीम जी कहते हैं कि अगर कोई अभद्र व्यक्ति अभद्रता से बात करें तो भद्र पुरुष को उस व्यक्ति को क्षमा कर देना चाहिए और विनम्रता से उसके साथ बात करनी चाहिए। आगे रहीम जी कहते हैं कि कोई बात नहीं अगर ॠषि भृगु ने भगवान विष्णु को लात मार दी क्या इससे उनका कुछ घट गया। उल्टा ॠषि भृगु उनकी विनम्रता देखकर नमस्तक हुए । हमारे धार्मिक ग्रंथों में विनम्रता को श्रेष्ठ और उत्तम गुण माना गया है ।

विनम्र और अहंकारी व्यक्ति को समझने के लिए यह उदाहरण कारगर साबित होगा। अंहकारी व्यक्ति उस खाली बर्तन की तरह है जिसमें कुछ कंकर भर दिए जाए तो थोड़ा सा हिलने पर भी आवाज करता है। विनम्र व्यक्ति उस भरें हुए बर्तन की तरह है जो अपने गुणों को अपने अंदर समेट कर रखता है और उसका दिखावा नहीं करता है।जब तूफान आता है जो पेड़ सीधे खड़े रहते हैं हवा उनको जड़ों से उखाड़ कर फेंक देती है ,जो पेड़ झुक जाते हैं वे उखड़ने और टूटने से अपने आप को बचा लेते हैं। विनम्रता कमजोरी की निशानी नहीं है यह निशानी है व्यक्ति के परिपूर्ण होने की।


स्वरचित एवं मौलिक

अमरजीत सिंह

जम्मू-कश्मीर, जम्मू


मंगलवार, 19 जनवरी 2021

समय का मोल - कविता

  # नमन मंच 🙏🙏🙏

#हिंददेश परिवार दिल्ली इकाई

# दिनांक - 14/05/2021

# दिन - शुक्रवार

# विषय- समय

# विधा - स्वैच्छिक

   

काम करके कमर जब टूटी 
लगती है किस्मत फूटी 
थोड़ी मिलती है मज़दूरी 
खाने को नहीं मिलती घी चूरी 
तब समझ आता है समय का मोल। 
घर का खर्च चल नहीं पाता
मनपसंद खाना खा नहीं पाता
दुखों को भोगने के लिए होता मजबूर 
तब समझ आता है समय का मोल।
बच्चा स्कूल जा नहीं पाता 
किताबों के बिना पढ़ नहीं पाता 
दुख की बनती है घनी छाया
तब समझ आता है समय का मोल।
पढ़ने के समय पढ़ा नहीं 
गुरु के अमूल्य ज्ञान को समझा नहीं
दुख ही दुख दिखता चारों ओर
तब समझ आता है समय का मोल।

अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर,जम्मू
 

सोमवार, 18 जनवरी 2021

खोज अपने आप की - लेख

     लेख - खोज अपने आप की 

"बंदे खोज दिल हर रोज ना फिर परेसानी माहि।"( भक्त कबीरदास जी महाराज)

आज का मानव खोजें खोजने में लगा हुआ है यह अच्छी बात है लेकिन उसने स्वयं को कभी खोजने का प्रयास ही नहीं किया। अगर मनुष्य स्वयं को खोज लेगा तो और कुछ खोजने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। इस खोज के लिए उसे कोई भारी भरकम किताबें पढ़ने की आवश्यकता नहीं है न ही धन का व्यय 
(ख़र्च) करने की ।
मानव को यह सोचना चाहिए कि इतनी
आरामदायक वस्तुओं के होते हुए भी वे दुखी क्यों है? उसे संतोष क्यों नहीं है? उसे इसके कारणों को ढूंढना होगा। इसका एक ही कारण हमें मिलेगा वो यह कि हमने ने अपने वास्तविक स्वरूप को भूला दिया हैं । इसके लिए श्री गुरु अमरदास जी महाराज ने अपनी पावन पवित्र वाणी में कहा है -
"मन तू जोत सरूप है अपना मूल पछान"

 हमारे अंतर्मन  में एक आवाज गूंजती है जिसे हम अनसुना कर देते है वो आवाज़ ही हमारे वास्तविक स्वरूप का बोध कराती है कि हम सब उस सर्वशक्तिमान  परमपिता परमेश्वर अंश है।
आत्मा कहती है कि मैं भी उस सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा की तरह प्रेम भावना से ओत-प्रोत हूं बैर और इर्ष्या से रहित हूं। इस सच की आवाज को हम अनसुना कर देते हैं। अगर हम सच्चे महापुरुषों, संतों, हरिजनों का संग कर लें तो हम खुशहाली से जीवन जी सकते हैं और अपने आप की खोज कर सकते है लेकिन संत, महापुरुष, हरिजन ईश्वर से जोड़ने वाला होना चाहिए। इससे यह होगा कि हम स्वयं को खोज पाएंगे और हमें कष्ट भरें जीवन से मुक्ति मिल जाएगी।
अपने आप को खोजने का सही अर्थ है स्वयं की कमियों को जानना और उसे दूर से  करने के लिए सत् चित् से प्रयास करना।
           
अमरजीत सिंह
सांबा ,जम्मू-कश्मीर

रविवार, 17 जनवरी 2021

जीवन बहती जलधारा है - कविता

   कविता - जीवन बहती जलधारा है

    जीवन बहती जलधारा है
    जिस में बहता जग सारा है
    इस धारा में बहते हुए अनेक संकट आते है
    जिनको दूर भागना है
   तभी तो हमको राह मिलेगी
  जीवन बहती जलधारा है
    जिस में बहता जग सारा है 
       जीवन की धरती में 
         जैसा बीजोगे वैसा ही फल पाओगे
            जीवन में धीरज को मित्र बनाने से
             आगे राह बनता जाता है
               जीवन बहती जलधारा है
    जिस में बहता जग सारा है।
जीवन के इस सफर में
अकेला सब अपने आप को पाते हैं
इस कर्मभूमि में कर्म का ही 
अच्छा- बुरा फल पाते हैं
जीवन बहती जलधारा है
    जिस में बहता जग सारा है।
जीवन की इस धारा को आगे बढ़ाने के लिए
अनेक बाधाओं को दूर भागना पड़ता है
जीवन भी अनेक रंग दिखाता है
जीवन बहती जलधारा है
    जिस में बहता जग सारा है।
                                    अमरजीत सिंह  
                                    जम्मू-कश्मीर, जम्मू

https://dhangurunanak1313.blogspot.com/2021/01/blog-post_17.html






शनिवार, 16 जनवरी 2021

यह मार्ग कठिन है पथिक - कविता

   कविता - यह मार्ग कठिन है पथिक 

पथिक यह मार्ग है कठिनाईयों 
यह मार्ग है पीर पराइयो का
मार्ग में अनेक रोड़े है
हर विपदा में अकेले है
यह मार्ग कठिन है पथिक
यह मार्ग कठिन है।
दुख को झेलना पड़ता है
रोते-रोते हंसना पड़ता है
दूर होती सुख की परछाई है
दुख ही मर्म बन जाता है
यह मार्ग कठिन है पथिक
यह मार्ग कठिन है।
रिश्तों का यहां मोल नहीं
मोह माया का शोर नहीं
बिरहा आग लगाता है
दुख सुख सहना आ जाता है
यह मार्ग कठिन है पथिक
यह मार्ग कठिन है।
(अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू)

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

गुरु बिन घोर अंधियारा - लेख

 # नमन मंच 🙏🙏🙏

#हिंददेश परिवार उतराखंड इकाई

# दिनांक - 24/04/2021

# दिन - शनिवार

# विषय - गुरु महिमा

# विधा - गद्य - पद्य

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः 

गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही  विष्णु है, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुर को प्रणाम ।इस संस्कृत श्लोक के अनुसार गुरु का स्थान ब्रह्माण्ड में सबसे ऊंचा है।

गुरु शब्द दो शब्दों के मेल से बना है गु और रु ।गु शब्द का अर्थ है अंधकार, अंधेरा या अज्ञान और रु का अर्थ है प्रकाश, रोशनी या ज्ञान।जो हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है उसे हम गुरु कहते हैं। हमारे संतों, महापुरुषों ने अपनी वाणी में गुरु को ईश्वर से बड़ा बताया है। भक्त कबीर दास जी कहते हैं कि 

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।

बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताए

वे कहते है कि गुरू और गोबिंद  एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को? ऐसी स्थिति में गुरू के चरणो कमलों में शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा  प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनके अनुसार गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती है।

गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।

गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।( भक्त कबीरदास जी)

गुरु के बिना हमें ज्ञान नहीं मिल सकता है क्योंकि ज्ञान के बिना ईश्वर प्राप्ति नहीं होती है। गुरु ज्ञान के बिना हमें सत्य असत्य का ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर ही हम ईश्वर का साक्षात्कार कर सकते हैं। गुरु हमें शारीरिक बंधनों से मुक्त करवाकर आति्मक सुख प्रदान करता है। गुरु भ्रम और मायाजाल में फंसे हुए जीवों को मुक्ति प्रदान करता है संसारिक मोह-माया में फंसे हुए जीवों को सत्य का ज्ञान गुरु द्वारा ही होता है गुरु के ज्ञान के बिना मानव जीवन व्यर्थ ही व्यतीत होता है क्योंकि मनुष्य की अज्ञानता उसे जीवन का लक्ष्य समझने ही नहीं देती।मानव जीवन के प्रयोजन को समझने के लिए गुरु का होना परमावश्यक है। गुरु के समस्त गुणों को लिख पाना असम्भव है क्योंकि गुरु की महिमा अपरम्पार है जिसके लिए भक्त कबीरदास जी कहते है कि -

सब धरती कागज करूँ,लिखनी सब बनराय |

सात समुद्र की मसि करूँ,गुरु गुण लिखा न जाय ||

वे कहते है कि सब पृथ्वी को कागज, सब जंगल को कलम, सातों समुद्रों को स्याही बनाकर लिखने पर भी गुरु के गुण नहीं लिखे जा सकते |

स्वरचित एवं मौलिक

 अमरजीत सिंह

जम्मू, जम्मू कश्मीर




गुरुवार, 14 जनवरी 2021

लेख - इंसानियत की पहचान क्या है?

 सबसे पहले हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि इन्सान कौन है, उसके अंदर कौन से गुण होने चाहिए। प्रथम जिस मनुष्य के हृदय में दया की भावना विद्यमान है वहीं इन्सान कहलाने का अधिकारी है।जब हम किसी दुःख देखकर दुखी हो, किसी का सुख देखकर सुखी हो। इससे हमें यह ज्ञात होगा कि हम इंसानियत सीख रहे है।जब हमारी दया धर्म,जाति, देश से ऊपर उठ जाती हैं तब हम इंसानियत के गौरव प्राप्त कर लेते है।

दया धर्म का मूल है 

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

धरती मां की गोद में - कविता


# विषय - धरती माता की गोद में

# विधा - स्वैच्छिक


             

धरती मां की गोद में , 

मिलते सुख अनंत, 

कण-कण में ममता भरी , 

हरे हरे वृक्षो की हवा , 

लगती मां के कोमल हाथों जैसी , 

तेरी गोद में कोई भेद भाव नहीं, 

जाति, रंग, धर्म का, 

तेरे पर्वतों की छाया में, 

दुलार मां के प्रेम जैसा, 

नदियों की निर्मल धारा , 

अमृत रस है सारा , 

खेत खलिहानों में , 

दिखता तेरा अन्नपूर्णा रूप, 

धरती मां तेरी गोद में , 

मिलते सुख अनंत।


स्वरचित एवं मौलिक

अमरजीत सिंह

जम्मू, जम्मू कश्मीर









लेख- जैसी संगत वैसी रंगत

      नमन मंच 🙏🙏🙏

#हिंददेश परिवार अमेरिका इकाई

दिनांक - 27 जून 2021 से 03जुलाई, 2021

 दिन - रविवार से शनिवार

#विषय - संगत की रंगत

विधा - गद्य - पद्म

  लेख- जैसी संगत वैसी रंगत 

"कबीर मन पंखी भइओ उड़ उड़ दह दिस   जाइ।जैसी संगत मिलै सो तैसो फल खाई।"

भक्त कबीरदास जी का यह दोहा संगति का महत्व प्रकट करता है। इस दोहे में भक्त कबीर दास जी ने मन की तुलना पक्षी से की है जो दस दिशाओं में घूमता रहता है।वह कहते हैं कि मनुष्य जैसी संगति करेगा उसी के अनुसार फल फल भी भुगतेगा। मनुष्य चरित्र के निर्माण संगति के अनुसार होता है उसकी संगति ही उसे अच्छा या बुरा बनाती है।साधु संतों की संगति उसे ईश्वरीय गुणों से भरपूर कर देती है। उसका अंतर में दया, संतोष, प्रेम,क्षमा, विनम्रता, सेवा, समर्पण, त्याग की भावना उत्पन्न होती है। सज्जन पुरुषों की संगति सही या ग़लत का निर्णय करने में सहायक सिद्ध होती है। दुर्जनों की संगति मनुष्य को विनाश की ओर ले जाती है और उसके अंतर में विनाशकारी गुणों को उत्पन्न करती है।बुरी संगति के प्रभाव के कारण हम घृणित कार्य करने में भी आनंद अनुभव करते हैं। क्योंकि हमारे हृदय में विकारों की मैल जम जाती है। विकारों की मैल हमारी बुद्धि और विवेक को शून्य कर देती है। अतः हमें संगति का चयन उसके परिणाम को सामने रखकर करना चाहिए।

अमरजीत सिंह

जम्मू-कश्मीर, जम्मू


सोमवार, 11 जनवरी 2021

कृपानिधि अब तो कृपा कीजिए

 कविता - कृपानिधि अब तो कृपा कीजे

कृपानिधि अब तो कृपा कीजे

मेरे अवगुणों को बख्श लीजे

तुम्हारी शरण मैं मांगू दिन रात

मोहे राखो देकर हाथ।

कृपासिंधु दीन दयालु

अपने जन पर सदा कृपालु

तेरे नाम दुख तोडनहार

मिट गया अज्ञान अंधियारा।

मैं अवगुण भरी तोहे पुकारा

मोहे नारायण एक सहारा

डूबत जन की लाज रखीजै

नाम  अपने की टेक दीजै।

नाम अपने का जाप जपीजै 

अपर अपार दर्शन दीजै 

तेरा दर्शन जन्म मरण का दुख मिटावै 

मन की सगल मैल गवावै।

अमरजीत सिंह

जम्मू-कश्मीर , जम्मू

















गुरुवार, 7 जनवरी 2021

जंग पर संकट

 जग पर संकट पड़ा है भारी
हमारी रक्षा करो वनवारी
हमारी तुम पर ही टेक 
तुम ठाकुर समर्थ देव।
जो जो तुम्हारी शरण आया देव
तिस का पार उतारा किया देव ।
हमें भी आस भरोसा थारो 
संकट भी थारे आगे हारो।
जो भी चाहा तुमसे पाया 
सदा भरें तेरे भंडारा।
इस संकट को क्षण में हरो
जग में सारे सुख करो।




विश्वास ही भक्ति है

 भक्ति का आरंभ ही विश्वास से होता है। विश्वास को उत्पन्न करने का माध्यम है हमारी श्रद्धा, श्रद्धा उत्पन्न होती है प्रेम से। भक्ति नाम है समर्पण का।समर्पण अपनी इच्छाओं और मनोकामनाओं का,जो नित्य हमारे हृदय में विद्यमान रहती हैं। भक्ति मार्ग विश्वास का मार्ग है। इसमें विश्वास ही साधक को ईश्वर से मिलाता है। साधक का विश्वास ही उसे इष्ट से मिलाता है। भक्ति मार्ग में साधक को ईश्वर के सर्वगुण और सर्वशक्तिमान होने पर विश्वास होना चाहिए।उसको ईश्वर को सर्वव्यापी मानकर भक्ति करनी चाहिए।हर एक वस्तु में ईश्वर को महसूस करना चाहिए।जब साधक हर एक वस्तु में ईश्वर को महसूस करता है उसकी निकटता परमेश्वर के साथ बढ़ती जाती है।उसका हर एक कार्य धर्म परायण हो जाता है जिससे संसार को आनंद मिलता है। सुखी संसार से साधक को शुभ आशीष मिलती है।नर सेवा नारायण सेवा का मार्ग साधक को अपनाना चाहिए। समाज सेवा की भावना मन को निर्मल करती है और निर्मल मन में भक्ति जल्दी प्रफुल्लित होती है।

प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है

 शीर्षक: प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है सभी ग्रंथों का सार  सभी एक है परिवार  बना ले इसको जीवन का आ...