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# दिनांक - 24/04/2021
# दिन - शनिवार
# विषय - गुरु महिमा
# विधा - गद्य - पद्य
गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः
गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुर को प्रणाम ।इस संस्कृत श्लोक के अनुसार गुरु का स्थान ब्रह्माण्ड में सबसे ऊंचा है।
गुरु शब्द दो शब्दों के मेल से बना है गु और रु ।गु शब्द का अर्थ है अंधकार, अंधेरा या अज्ञान और रु का अर्थ है प्रकाश, रोशनी या ज्ञान।जो हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है उसे हम गुरु कहते हैं। हमारे संतों, महापुरुषों ने अपनी वाणी में गुरु को ईश्वर से बड़ा बताया है। भक्त कबीर दास जी कहते हैं कि
गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताए
वे कहते है कि गुरू और गोबिंद एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को? ऐसी स्थिति में गुरू के चरणो कमलों में शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनके अनुसार गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती है।
गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।
गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।( भक्त कबीरदास जी)
गुरु के बिना हमें ज्ञान नहीं मिल सकता है क्योंकि ज्ञान के बिना ईश्वर प्राप्ति नहीं होती है। गुरु ज्ञान के बिना हमें सत्य असत्य का ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर ही हम ईश्वर का साक्षात्कार कर सकते हैं। गुरु हमें शारीरिक बंधनों से मुक्त करवाकर आति्मक सुख प्रदान करता है। गुरु भ्रम और मायाजाल में फंसे हुए जीवों को मुक्ति प्रदान करता है संसारिक मोह-माया में फंसे हुए जीवों को सत्य का ज्ञान गुरु द्वारा ही होता है गुरु के ज्ञान के बिना मानव जीवन व्यर्थ ही व्यतीत होता है क्योंकि मनुष्य की अज्ञानता उसे जीवन का लक्ष्य समझने ही नहीं देती।मानव जीवन के प्रयोजन को समझने के लिए गुरु का होना परमावश्यक है। गुरु के समस्त गुणों को लिख पाना असम्भव है क्योंकि गुरु की महिमा अपरम्पार है जिसके लिए भक्त कबीरदास जी कहते है कि -
सब धरती कागज करूँ,लिखनी सब बनराय |
सात समुद्र की मसि करूँ,गुरु गुण लिखा न जाय ||
वे कहते है कि सब पृथ्वी को कागज, सब जंगल को कलम, सातों समुद्रों को स्याही बनाकर लिखने पर भी गुरु के गुण नहीं लिखे जा सकते |
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू, जम्मू कश्मीर
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