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शनिवार, 28 दिसंबर 2024

पिता दशमेश के लाल

 पिता दशमेश अद्भुत तेरे लालों की कुर्बानी 

इस जहान तेरा नहीं कोई सानी 

रखी न अपने पास कोई निशानी 

तेरा जैसा कोई न बडा दानी ।।

दो लाल ने दी चमकौर गढ़ी में कुर्बानी 

अपनी वीरता शौर्यता से जालिमों को याद करवा दी उनकी नानी

गुरु तेग बहादुर के पोते भी बलिदानी 

मानव सेवा ही साहिबजादों ने बड़ी मानी।।

छोटे साहिबजादों को देखकर बजीर खान को हुई हैरानी 

धर्म पर अडिग रहने की शक्ति उसने जानी 

सरबस दानी पिता के पुत्र दे गए प्राणों की कुर्बानी 

सृष्टि का कण कण गाता उनकी वीरता की अमर कहानी।।

स्वरचित एवं मौलिक 

अमरजीत सिंह 

जिला सांबा,  जम्मू-कश्मीर 



 

शनिवार, 7 दिसंबर 2024

मनुष्य जीवन का उद्देश्य

 खाना पीना याद रहा ,

हँसना हँसाना न भूला ,

छल कपट करना भी स्मरण ,

भूला सिर्फ मानव जीवन का उद्देश्य ।।

 तभी तो दर- दर भटकता फिर रहा,

बनाकर भिक्षुक जैसा भेष ,

कहीं से तो खैर मिल जाए ,

भूला बैठा अपना सच्चा देश ।।

इच्छा ही इच्छा से घिरा ,

मन का खो बैठा चैन ,

आँखों में अब नींद कहाँ, 

भूल गया मनुष्य जन्म की छोटी ही है रैण।।

जरा रोग जब काया ग्रस्ता गया 

तब भी याद न आया सच्चा सैण 

अब पश्चात रहा जब टूटी श्वासों की माला 

पूरी उम्र लगा रहा मन बुद्धि पर ताला ।।

गुनाह गुनाह करता गुनाहगार गया बन

सेवा सिमरन सत्संग में जाकर न साधा कभी मन 

पाप पुण्य   को बिसरा कर जमा करता रहा पूंजी 

अब पछताने से क्या  मनुष्य जन्म है  वज्र कपाट खोलने की कुंजी।।

स्वरचित एवं मौलिक 

अमरजीत सिंह 

जिला - सांबा ,जम्मू-कश्मीर 


 

मंगलवार, 3 दिसंबर 2024

कलयुग

शीर्षक- कलयुग में अंधेरा ही अंधेरा

कलयुग में अंधेरा ही अंधेरा ,

सिर्फ रहा गया तेरा मेरा ,

विषय विकारों का चारों ओर घेरा ,

 मानव बन गया माया का चेरा ।

एक दिन कूच होगा यहां से डेरा 

यही बात मन है भूलेरा 

कुछ नही है इस जहान पर तेरा 

ये सब है कलयुग का फैलाया अंधेरा।।

रिश्तों की पतली पड़ गई  डोरी 

धन दौलत को सब कुछ मानकर दुनिया हो गई भोरी 

भाषा बोलती बिल्कुल कोरी 

ऐसे टूटती जा रही रिश्तों की डोरी ।।

धर्म कर्म बन गया रस्मकारी 

दिखावे की सब ओर फैल रही बीमारी 

पाखंड द्वैत करने को मनाते सब होशियारी 

ईश्वर को भूलना है अहितकारी।।

स्वरचित एवं मौलिक

 अमरजीत सिंह 

जिला - सांबा,  जम्मू-कश्मीर 





सोमवार, 2 दिसंबर 2024

नई शुरूआत


 मन की दुविधा का हो गया नाश ,

अद्भुत है नाम का प्रकाश ,

नाम का रंग अति गूढ़ा लागा ,

यम का दूत डर कर भागा।

सब आसरे छोड़कर शरणाई आया,

दुर्भाग्य को सौभाग्य बनाया ,

भवसागर  निज हस्त दे पार करीजै,

शरणागत की अब लाज रखीजै।

दीन दुनिया की लाज गवाई, 

ह्रदय बस गए कृष्ण कन्हाई,

मन के खुल गए सब कपाट,

नित्य देखा रहा हूँ तुम्हारी बाट।


स्वरचित एवं मौलिक

 अमरजीत सिंह 

जिला - सांबा ,जम्मू-कश्मीर 



प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है

 शीर्षक: प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है सभी ग्रंथों का सार  सभी एक है परिवार  बना ले इसको जीवन का आ...