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शनिवार, 3 मई 2025

पेड़ से गिरता पत्ता

 शीर्षक -  पेड़ से गिरता पत्ता 

पेड़ से गिरता पत्ता दे रहा संदेश ,

जिस जग को तूने अपना मान लिया ,वो है पराया देश। 

सब से प्रीत लगा रहा ,

जो तुझे दिख रहे सबका झूठा भेष ।

माया ठगनी अनेक ठगे ,

झूठ को न सच मान , मायावी संसार में झूठ बन बैठा प्रधान।

भूखे को भूखा समझे नहीं ,

धनवान को कर रहा अन्न दान , यही है कलयुग होने का प्रमाण। 

सच ठोकर खाता फिर रहा ,

अंधा न्याय अन्याय न विचार सके, सब ओर अज्ञान ही अज्ञान। 

गरीब का दुखड़ा कोई न सुनता,

सब में माया का अभिमान,  अधर्म की यही पहचान। 

पराया हक खाना समझते बहुत महान,

मजदूर अपने हक को तरसे , भूखे भूखे चली गई जान ।

यमफंदा  भुलाता फिर रहा ,

उड़ जाएगे पंछी रूपी प्राण, तेरे स्नेही पहुंच देगे श्मशान।


स्वरचित एवं मौलिक 

अमरजीत सिंह 

जिला सांबा ,जम्मू-कश्मीर 



 


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