शीर्षक - पेड़ से गिरता पत्ता
पेड़ से गिरता पत्ता दे रहा संदेश ,
जिस जग को तूने अपना मान लिया ,वो है पराया देश।
सब से प्रीत लगा रहा ,
जो तुझे दिख रहे सबका झूठा भेष ।
माया ठगनी अनेक ठगे ,
झूठ को न सच मान , मायावी संसार में झूठ बन बैठा प्रधान।
भूखे को भूखा समझे नहीं ,
धनवान को कर रहा अन्न दान , यही है कलयुग होने का प्रमाण।
सच ठोकर खाता फिर रहा ,
अंधा न्याय अन्याय न विचार सके, सब ओर अज्ञान ही अज्ञान।
गरीब का दुखड़ा कोई न सुनता,
सब में माया का अभिमान, अधर्म की यही पहचान।
पराया हक खाना समझते बहुत महान,
मजदूर अपने हक को तरसे , भूखे भूखे चली गई जान ।
यमफंदा भुलाता फिर रहा ,
उड़ जाएगे पंछी रूपी प्राण, तेरे स्नेही पहुंच देगे श्मशान।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जिला सांबा ,जम्मू-कश्मीर
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