शीर्षक - शहीदों के सिरताज
गुरु अर्जुन देव को नित नित शीश झुकाता हूं
महिमा उनकी दिल से गाता हूं
माता भानी के लाल की शहीदी गाथा सुनाता हूं
गुरु नानक की पांचवी इलाही ज्योति को अपना मस्तक बार बार भेंट चढ़ता हूं
उबलते पानी में भी बैठकर ईश्वर का शुक्रराना करने वाले दाता को बलिहारी जाता हूं
तपती रेत तन पर पड़ने पर भी शीतलता से भी शीतल दिखने वाले सतगुरु जी को श्रद्धा सुमन चढ़ाता हूं
गर्म तपती तवी पर बैठकर ईश्वर स्तुति करने वाले सतगुरु जी का निर्भय रूप दिखाता हूं
मानवता के रक्षक सतगुरु अर्जुन देव जी के महान परोपकार के आगे अपना शीश झुकाता हूं।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जिला: सांबा, जम्मू कश्मीर
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