गोविंद मिलन कारण तुम जग आए ,
माया संग क्यों उलझाए जाए।
झूठ देख क्यों लपटाया ,
समझ ना पाए देश है पराया।
मोह माया में मन उलझाया ,
झूठी है संसार की सुख छाया।
हर रिश्ते में है मतलब परस्ती,
धन पर टिकी है इंसान की हस्ती ।
धर्म कर्म का है दिखलावा,
समझ ना पाया कलयुग का छलावा।
सिमरन भजन मुक्ति का द्वार ,
बाहरी पाखंड में उलझा गंवार।
मानस देह में ही मिटेगा आना जाना,
भजन सिमरन गोविंदा का अब क्यों भूलना।
गोविंद मिलन कारण जग आया ,
पड़ जा साधु-संत शरणाया ।
श्वास-श्वास गा गोविंद राया,
तब मिलेगी प्रभु प्रेम की छाया। ।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जिला - सांबा , जम्मू-कश्मीर