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शनिवार, 7 दिसंबर 2024

मनुष्य जीवन का उद्देश्य

 खाना पीना याद रहा ,

हँसना हँसाना न भूला ,

छल कपट करना भी स्मरण ,

भूला सिर्फ मानव जीवन का उद्देश्य ।।

 तभी तो दर- दर भटकता फिर रहा,

बनाकर भिक्षुक जैसा भेष ,

कहीं से तो खैर मिल जाए ,

भूला बैठा अपना सच्चा देश ।।

इच्छा ही इच्छा से घिरा ,

मन का खो बैठा चैन ,

आँखों में अब नींद कहाँ, 

भूल गया मनुष्य जन्म की छोटी ही है रैण।।

जरा रोग जब काया ग्रस्ता गया 

तब भी याद न आया सच्चा सैण 

अब पश्चात रहा जब टूटी श्वासों की माला 

पूरी उम्र लगा रहा मन बुद्धि पर ताला ।।

गुनाह गुनाह करता गुनाहगार गया बन

सेवा सिमरन सत्संग में जाकर न साधा कभी मन 

पाप पुण्य   को बिसरा कर जमा करता रहा पूंजी 

अब पछताने से क्या  मनुष्य जन्म है  वज्र कपाट खोलने की कुंजी।।

स्वरचित एवं मौलिक 

अमरजीत सिंह 

जिला - सांबा ,जम्मू-कश्मीर 


 

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