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मंगलवार, 3 दिसंबर 2024

कलयुग

शीर्षक- कलयुग में अंधेरा ही अंधेरा

कलयुग में अंधेरा ही अंधेरा ,

सिर्फ रहा गया तेरा मेरा ,

विषय विकारों का चारों ओर घेरा ,

 मानव बन गया माया का चेरा ।

एक दिन कूच होगा यहां से डेरा 

यही बात मन है भूलेरा 

कुछ नही है इस जहान पर तेरा 

ये सब है कलयुग का फैलाया अंधेरा।।

रिश्तों की पतली पड़ गई  डोरी 

धन दौलत को सब कुछ मानकर दुनिया हो गई भोरी 

भाषा बोलती बिल्कुल कोरी 

ऐसे टूटती जा रही रिश्तों की डोरी ।।

धर्म कर्म बन गया रस्मकारी 

दिखावे की सब ओर फैल रही बीमारी 

पाखंड द्वैत करने को मनाते सब होशियारी 

ईश्वर को भूलना है अहितकारी।।

स्वरचित एवं मौलिक

 अमरजीत सिंह 

जिला - सांबा,  जम्मू-कश्मीर 





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