लेख - खोज अपने आप की
"बंदे खोज दिल हर रोज ना फिर परेसानी माहि।"( भक्त कबीरदास जी महाराज)
आज का मानव खोजें खोजने में लगा हुआ है यह अच्छी बात है लेकिन उसने स्वयं को कभी खोजने का प्रयास ही नहीं किया। अगर मनुष्य स्वयं को खोज लेगा तो और कुछ खोजने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। इस खोज के लिए उसे कोई भारी भरकम किताबें पढ़ने की आवश्यकता नहीं है न ही धन का व्यय
(ख़र्च) करने की ।
मानव को यह सोचना चाहिए कि इतनी
आरामदायक वस्तुओं के होते हुए भी वे दुखी क्यों है? उसे संतोष क्यों नहीं है? उसे इसके कारणों को ढूंढना होगा। इसका एक ही कारण हमें मिलेगा वो यह कि हमने ने अपने वास्तविक स्वरूप को भूला दिया हैं । इसके लिए श्री गुरु अमरदास जी महाराज ने अपनी पावन पवित्र वाणी में कहा है -
"मन तू जोत सरूप है अपना मूल पछान"
हमारे अंतर्मन में एक आवाज गूंजती है जिसे हम अनसुना कर देते है वो आवाज़ ही हमारे वास्तविक स्वरूप का बोध कराती है कि हम सब उस सर्वशक्तिमान परमपिता परमेश्वर अंश है।
आत्मा कहती है कि मैं भी उस सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा की तरह प्रेम भावना से ओत-प्रोत हूं बैर और इर्ष्या से रहित हूं। इस सच की आवाज को हम अनसुना कर देते हैं। अगर हम सच्चे महापुरुषों, संतों, हरिजनों का संग कर लें तो हम खुशहाली से जीवन जी सकते हैं और अपने आप की खोज कर सकते है लेकिन संत, महापुरुष, हरिजन ईश्वर से जोड़ने वाला होना चाहिए। इससे यह होगा कि हम स्वयं को खोज पाएंगे और हमें कष्ट भरें जीवन से मुक्ति मिल जाएगी।
अपने आप को खोजने का सही अर्थ है स्वयं की कमियों को जानना और उसे दूर से करने के लिए सत् चित् से प्रयास करना।
अमरजीत सिंह
सांबा ,जम्मू-कश्मीर
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