भक्ति का आरंभ ही विश्वास से होता है। विश्वास को उत्पन्न करने का माध्यम है हमारी श्रद्धा, श्रद्धा उत्पन्न होती है प्रेम से। भक्ति नाम है समर्पण का।समर्पण अपनी इच्छाओं और मनोकामनाओं का,जो नित्य हमारे हृदय में विद्यमान रहती हैं। भक्ति मार्ग विश्वास का मार्ग है। इसमें विश्वास ही साधक को ईश्वर से मिलाता है। साधक का विश्वास ही उसे इष्ट से मिलाता है। भक्ति मार्ग में साधक को ईश्वर के सर्वगुण और सर्वशक्तिमान होने पर विश्वास होना चाहिए।उसको ईश्वर को सर्वव्यापी मानकर भक्ति करनी चाहिए।हर एक वस्तु में ईश्वर को महसूस करना चाहिए।जब साधक हर एक वस्तु में ईश्वर को महसूस करता है उसकी निकटता परमेश्वर के साथ बढ़ती जाती है।उसका हर एक कार्य धर्म परायण हो जाता है जिससे संसार को आनंद मिलता है। सुखी संसार से साधक को शुभ आशीष मिलती है।नर सेवा नारायण सेवा का मार्ग साधक को अपनाना चाहिए। समाज सेवा की भावना मन को निर्मल करती है और निर्मल मन में भक्ति जल्दी प्रफुल्लित होती है।
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