कविता - अन्नदाता की पुकार
मैंने कई धूपों को झेला है
मुझे न समझो अकेला है
अपने हक़ के लिए लडूंगा मैं
नहीं तो यहीं मरूंगा मैं
अन्नदाता की पुकार सुन ले सरकार।
मुझे ऐसे ही नहीं अन्नदाता कहता संसार
फसल पैदा करने के लिए झेलता हूं कष्ट अपार
मैं तेरे आगे नहीं झुकने वाला
मैं हूं बहुत हिम्मतवाला
अपने पाने के लिए हूं मतवाला
अन्नदाता की पुकार सुन ले सरकार।
मैं बंजर भूमि को हरा भरा बना देता हूं
फसल को सींचने के लिए
खून पसीना बहा देता हूं
मैंने उल्टा दिए तख्त अपार
अब न हो तेरी बार
अन्नदाता की पुकार सुन ले सरकार।
काले कानून वापिस लेने होंगे
फसलों के सही मूल्य देने होंगे
अब नहीं मैं पीछे हटने वाला
अड़ा रहा हूं हक़ के लिए हर बार
अन्नदाता की पुकार सुन ले सरकार।
अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू
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