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सोमवार, 25 जनवरी 2021

संसार मुसाफिर खाना है

  कविता - संसार मुसाफिर खाना है

  संसार मुसाफिर खाना है
  एक ने आना एक ने जाना है
   यह तो रैन बसेरा है
   तूं कहे सब कुछ मेरा है।
    
    झूठी शान मान की खातिर 
    अनेक पापा कमाता है
     धन संचित करने में व्यस्त
      अपना धर्म गंवाता है।

    मोह माया के जाल में फंसकर
    अच्छे बुरे कर्म कमाता
  जिन कर्मो को करने से बचना था
  उनमें रूचि दिखाता है।

अंत  समय जब तेरा आया
अब क्यों चिल्लता है
जो तूं साथ लेकर आया था
वो भी तूने गंवाया है।

अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू

 
        

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