शीर्षक- नर सेवा नारायण सेवा
# विधा - स्वैच्छिक
नर सेवा नारायण सेवा
"सेवा परमो धर्म:" सेवा सबसे बड़ा धर्म है । हमारा भारत देश नर सेवा नारायण सेवा के सिद्धांत को मानता है हमारे ऋषियों, मुनियों, अवतारों ने अपनी पावन पवित्र वाणी में मानव सेवा को सर्वोपरि माना है। सेवा निष्काम भाव से करनी चाहिए। सेवा का आरंभ हमारे स्वयं गृह से होता है माता-पिता, पत्नी और बच्चों की सेवा आदि।
जब सेवा का दायरा घर की दहलीज को पार कर समाज की ओर बढ़ता है तब उसे मानवता की सेवा कहा जाता है। जिसमें हम अपना तन ,मन ,धन सब सेवा में अर्पण करते हैं। सेवा करने से हमारा मन स्वच्छ और निर्मल होता है।
हमारे अंतर्मन में प्रेम भावना ओत प्रोत हो जाती है हमें सब में ईश्वर की ज्योति नजर आती है।सेवा का फल हमें तभी मिलेगा जब हम सेवा निष्काम भाव से और अहंकार से रहित होकर करेंगे। सेवा करते समय जात-पात, धर्म, वर्ण, रंग, रूप में आदि का भेद भाव नहीं होना चाहिए बल्कि सभी मनुष्यों से समभाव रखना चाहिए। दूसरों की भलाई के लिए प्राण न्यौछावर करने तक तत्पर रहना चाहिए।
अपनी योग्यता के अनुसार हर एक जरूरतम मनुष्यों की सहायता करनी चाहिए।
निष्काम भाव से की गई सेवा हमारे लिए बैकुंठ धाम के कपाट खोल देती है इस संसार में और ईश्वर के द्वार में सर्वोच्च स्थान प्राप्त होता है।हर किसी जरूरतमंद मनुष्य की सहायता के लिए हमें हमेशा तत्पर रहना चाहिए कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। सेवा हर एक मनुष्य नहीं कर सकता यह तो ईश्वर द्वारा चयनित कुछ ही लोग कर सकते हैं जिन्हें ईश्वर इसके योग्य मानता है। सेवा करने से हमें जो आनंद प्राप्त होता है उसे मापा नहीं जा सकता है मानवता प्रेम से करना और ईश्वर से प्रेम करने के समान है।
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