कविता - पक्षी बन उड़ जाऊं
मन करता है पक्षी बन उड़ जाऊं
सरहदों की दीवार हटाऊ
सब को मिलकर गले लगाऊं
धर्म देश का दिल से भेद भाव हटाऊ
सब में प्रेम भाव बांटता जाऊं
नफ़रत को हृदय से मिटाऊं
सब को मिलकर रहना सिखाऊं
प्रेम प्रीत की राह बताऊं
बैर विरोध को जीवन से भगाऊ
कण कण में जो बसता है
उसी का इनको राह बताऊं
इंसान जिस भ्रम में जी रहा है
एक दूसरे का लहू पी रहा है
सब को जीवन का असली उद्देश्य बताऊं
सब ग्रंथों का सार सुनाऊं
सब के अंदर जो प्रीतम बैठा
तिस की बात बताऊं
जो तूं अंधकार में बैठा
अंदर तेरे ज्ञान का दीप जलाऊं।
अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू
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