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बुधवार, 7 मई 2025

जलती फसले रोता बिलखता किसान

 शीर्षक -  जलती फसले रोता बिलखता किसान 

गर्मी धूप में जलाता अपने प्राण ,

तन में कुछ शेष बची है जान,

कड़ी मेहनत से लगाता धान,

जलती फसले रोता बिलखता किसान ।

गरीबी तंगी में बीतता जीवन 

कैसे खुश रहे बिन धन 

दुख तकलीफ में डूबा घर का हर जन

जलती फसले रोता बिलखता किसान ।

जल गई फसल चढ़ गया ऋण 

बनता जा रहा है हर दिन निर्धन 

जीवन जी नहीं बीता रहा गिन दिन 

जलती फसले रोता बिलखता किसान ।

जीवन से खुशियाँ दूर होती हर क्षण 

पल पल जड़ता जा रहा जीवन का वन

फसल बर्बाद होने से उजड गया नव आशाओं का स्वप्न 

जलती फसले रोता बिलखता किसान ।


स्वरचित एवं मौलिक 

अमरजीत सिंह 

जिला सांबा ,जम्मू-कश्मीर 



 

 



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