शीर्षक - जलती फसले रोता बिलखता किसान
गर्मी धूप में जलाता अपने प्राण ,
तन में कुछ शेष बची है जान,
कड़ी मेहनत से लगाता धान,
जलती फसले रोता बिलखता किसान ।
गरीबी तंगी में बीतता जीवन
कैसे खुश रहे बिन धन
दुख तकलीफ में डूबा घर का हर जन
जलती फसले रोता बिलखता किसान ।
जल गई फसल चढ़ गया ऋण
बनता जा रहा है हर दिन निर्धन
जीवन जी नहीं बीता रहा गिन दिन
जलती फसले रोता बिलखता किसान ।
जीवन से खुशियाँ दूर होती हर क्षण
पल पल जड़ता जा रहा जीवन का वन
फसल बर्बाद होने से उजड गया नव आशाओं का स्वप्न
जलती फसले रोता बिलखता किसान ।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जिला सांबा ,जम्मू-कश्मीर
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