शीर्षक - सतगुर प्रीत अति मीठी
सतगुर प्रीत अति मीठी ,की न जा सके बयान।
पल पल बढ़ती जात है, बिरह निकाले तन से जान।
रोम रोम बस गई, जैसे दूध में होत मिष्ठान्न ।
प्रीत मिटाय न मिटे, अमूल्य निधि सतगुर सुजान।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
सांबा ,जम्मू-कश्मीर
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