=हिंद की चादर
चाँदनी चौक जिसके खून में नहाया था ,
मुगलों का आसन जिसने हिलाया था ,
प्राणों की आहुति देकर सबका धर्म बचाया था ,
हिंद की चादर होने का सम्मान, तभी तो सतगुर ने पाया था।।
वीर नहीं वो महावीर थे ,
दीन दुखियों के वो ही पीर थे ,
दीन की रक्षा के लिए सतगुर ने कदम बढ़ाए थे ,
तीन गुरसिक्खों भी सतगुर संग प्राण चढ़ाने आए थे ।।
सतगुर का किसी संग न बैर था,
कोई भी उनके के लिए गैर न था ,
कश्मीरी पंडितों ने धर्म रक्षा के लिए सतगुर को पुकारा था ,
वचन देकर सतगुरु ने कश्मीरी पंडितों का धैर्य बाँधा था।।
जालिम हुकूमत के सरदार सतगुर के सत इरादों से घबराए थे,
सतगुर पर ढेरों जुल्म पापियों ने ढाए थे ,
धर्म आजादी की आवाज सतगुर उठाते थे ,
जालिमों के जुल्म के आगे शीश कभी न झुकाते थे।।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जिला - सांबा , जम्मू-कश्मीर
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