#गहरी गहरी नदी में
मेरे सतगुरु जी गहरी गहरी नदी में ठंडा पानी पानी
अकेली अकेली बहती मैं जा
कोई ना पकड़े मेरी बांह
अब आत्मा को कौन देगा थाह
मेरे सतगुरु जी गहरी गहरी नदी में ठंडा पानी पानी
अकेली अकेली बहती मैं जा ............
सारी उम्र जिनके के लिए पैसा कमाया
धर्म कर्म मैंने कुछ नहीं कमाया
इन्होंने भी किया मेरे साथ द्रोह
अब मैंने जाना झूठे थे सारे वो मोह
मेरे सतगुरु जी गहरी गहरी नदी में ठंडा पानी पानी
अकेली अकेली बहती मैं जा .............
छल कपट से पैसा कमाया इंसानियत को मैंने भुलाया
बेईमानी का पैसा सबको खिलाया
लेखा देना मुझको परम सत्य झुठलाया
मानव जन्म का परम अवसर व्यर्थ में गंवाया
मेरे सतगुरु जी गहरी गहरी नदी में ठंडा पानी पानी
अकेली अकेली बहती मैं जा .........
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जिला - सांबा, जम्मू कश्मीर
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