शीर्षक - मानव तन
मानव तन प्रभु का अमूल्य उपहार
नासमझी में समय न करो बर्बाद
मानव तन देव भी चाहते
पर हासिल नहीं कर पाते
मानव तन प्रभु मंदिर कहलाता
पावन पवित्र माना जाता
मानव तन में रहकर ही प्रभु भक्ति होती
अवसर खोकर चौरासी लाख योनियां भोगनी पड़ती
जैसे पत्ता पेड़ से गिरकर दुबारा लग नहीं पाता
वैसे मानव तन अवसर बीतने पर नाश हो जाता
मानव तन में रहकर परोपकार कमाते हैं
दुनिया की सेवा कमाकर इसे सफल बनाते हैं ।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
सांबा,जम्मू कश्मीर
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