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गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

जिंदगी भी पेड़ पौधों पर आई बहार सी लगती है

 शीर्षक -जिंदगी भी पेड़ पौधों पर आई बहार सी लगती है

जिंदगी भी पेड़ पौधों पर आई बहार सी लगती है

जो कुछ समय के लिए ही बनी रहती है

जैसे पेड़ पौधों पर नये नये पत्ते बहुत ही मनभावन लगते हैं 

वैसे ही बचपन , जवानी में कुछ भी करने को तैयार रहते है 

बचपन को खेलों और बड़ों के स्नेह में बिताते हैं

दुख सुख की भावना हमें छू नहीं पाती है

जवानी के दौर में बहुत जोशीलापन दिखाता है 

पहाड़ भी कंकर सा नजर आता है

बूढ़े होने पर शरीर जर्जर हो जाता है

खाली बर्तन भी उठाना मुश्किल बन आता है

पेड़ के पत्तों की तरह आत्मा भी शरीर को छोड़ जाती है

जिंदगी की बहार भी फिर दुबारा नहीं मिल पाती है 

स्वरचित एवं मौलिक

अमरजीत सिंह

जिला - सांबा,  जम्मू कश्मीर



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