शीर्षक - मेरे मन जगत की झूठी प्रीति त्याग
मेरे मन जगत की झूठी प्रीति त्याग
प्रभु का सिमरन करो दिन रात
मेरे मन जगत की झूठी..................
इस जग में कोई नहीं तेरा
सोच समझ अब मन में विचार
मेरे मन जगत की झूठी..................
सुख के सभी साथी बनते
दुख आने पर जाते दूर भाग
मेरे मन जगत की झूठी..................
सबका प्यार काया तक सीमित
पक्षी के उड़ जाने पर छोड़ आएंगे श्मशान
मेरे मन जगत की झूठी..................
अच्छे बुरे कर्मों का लेखा तूं ही देगा
कोई नहीं देगा तेरा साथ
मेरे मन जगत की झूठी..................
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जिला सांबा जम्मू कश्मीर
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