शीर्षक - कुर्सी की चाहत
कुर्सी की चाहत नेताओं को नौटंकी बाज बनाती है
बिना साज बाजे के नाच नचाती है
जनता भी बेचारी अपना अमूल्य वोट गंवाती है।
हर कोई नेता अपना उल्लू सीधा करता है
अपनी इच्छा को पूरा करने का हर हथकंडा अपनाता है
अपने पखंड से जनता का हितकारी बनने की नौटंकी रचता है।
कुर्सी की चाहत नेताओं को नौटंकी बाज बनाती है
मदारी के बंदर जैसा नाच नचाती हैं
हर किसी को भ्रमजाल में फंसाती है।
हर नेता जाति, धर्म , भाषा को माध्यम बनाता है
जनता की भावनाओं का ग़लत फायदा उठाता है
अपनी कुर्सी की खातिर सबको बेबकूफ बनाता है।
नेताओं की कुर्सी की चाहत लोकतंत्र की मजबूती घटाती है
जनता भी बेचारी मजबूर सी बनती जाती है
अपना अमूल्य वोट खोकर सदा पछताती रहती है।
शराब , पैसे से वोट हमेशा खरीदा जाता है
कुर्सी पाने के लिए चोर मूचका यह तरीका भी अपनाता हैं
अपनी राजनीति को चमकाने के लिए देश हित भूल जाता हैं।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जिला - सांबा , जम्मू कश्मीर
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