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बुधवार, 21 जुलाई 2021

मेरे मन की यह अभिलाषा

 #शीर्षक- मन की यह अभिलाषा

मेरे मन की यह अभिलाषा, 

सबको प्रेम की भाषा सिखाऊं

मन के अंदर की मैल हटाऊँ, 

मन मंदिर में हरिनाम की ज्योति जगाऊँ, 

सबको अपना मीत बनाऊँ, 

अपने पराये का भेद मिटाऊं, 

सबको स्नेह से गले लगाऊं, 

ऊंच नीच का अंतर  भुलाऊँ, 

धर्म के नाम पर लड़ने वालों को, 

धर्म की सही परिभाषा सिखाऊं, 

प्रकृति के कण -कण में ईश्वर की ज्योति दिखाऊँ, 

ईश्वर के सर्वव्यापी होने की निशानी बताऊँ, 

राजनीति में फैलाई स्वार्थ की भावना सबको बताऊँ, 

लोगों को आपस में लड़ने से बचाऊँ, 

भारतीय संस्कृति की खासियत सबको बतलाऊं, 

आने वाली पीढ़ियों को संस्कृति को संभालने के लिए कह जाऊँ, 

हर नागरिक को उसके कर्तव्य के बारे में बतलाऊं, 

अपने भारतीय होने का कर्तव्य निभाऊं, 

अपना श्वास श्वास मानव सेवा में लगाऊं, 

मानव होने का कर्तव्य निभा जाऊँ । 


स्वरचित एवं मौलिक 

अमरजीत सिंह 

जिला - सांबा, जम्मू कश्मीर




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