#विषय- चांद
विधा - गद्य - पद्य
चांद तूं भी कभी पूरा या आधा होता,
मेरा जीवन भी तेरी तरह कभी अधूरा होता,
पूर्णता की तलाश में भटकता रहता हूँ,
हर गम को भी खुशी से अपना लेता हूँ,
मै भी तेरी तरह अकेला जीता हूँ,
लाखों यार भी मेरेे मेरी तन्हाई को दूर नहीं कर पाते हैं,
मेरे जीवन में भी कभी पूर्णिमा की रात आएगी,
मेरे अधूरापन को पूर्ण कर जाएगी,
चांद तेरी खूबसूरती सबको भाती है,
तुझे पाने की चाह हृदय में बन जाती हैं,
तेरी रोशनी अंधेरो भगाती है,
मन में आशा दीपक जलाती है,
चांद चकोर तेरे प्रीत लगाता है,
तूं उसकी भावनाओं को समझ नहीं पाता ,
तेरी अनदेखी उसे रुलाती है,
जीवन जीने की आस उसमें घट जाती है,
चांद मेरे पिया को मेरा संदेश पहुंचाना,
बफा ना निभाने वाले को बेबफा कहता है जमाना ।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू , जम्मू कश्मीर
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