नमन मंच 🙏🙏🙏
# साहित्यिक महफ़िल परिवार
# दिनांक - ११/०७/२०२१
# दिन - रविवार
# विषय - मित्रता
# विधा - परिचर्चा
एक दिन गौरव और अरूण ने दूरदर्शन में श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता का प्रसंग देखा। अब उनके मन में श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता के बारे में अधिक जानने की जिज्ञासा पैदा हुई ।
जिज्ञासा बश अपने अधयापक के घर पहुँच गए, अध्यापक ने आने का कारण पूछा, दोनों ने स्पष्ट शब्दों में बता दिया। अध्यापक ने कहा मुझे खुशी हुई कि तुम दोनों को श्री कृष्ण और सुदामा जी की मित्रता के बारे में जिज्ञासा है।
अध्यापक ने बताना शुरू किया श्री कृष्ण और सुदामा जी बचपन से ही घनिष्ठ मित्र थे, आपस में दोनों का बहुत प्यार था। दोनों ने गुरु संदीपनी से शिक्षा ग्रहण की । शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात श्री मथुरा आ गए और सुदामा जी अपने गाँव वृदांवन लौट आए ।
कुछ बर्षो बाद श्री कृष्ण द्वारिका नगरी के राजा बन गए और सुदामा गरीबी में जीवन बिताने लगा। सुदामा की पत्नी वसुंधरा ने सुदामा को श्री कृष्ण के पास जाने के लिए मजबूर किया क्योंकि वह भी गरीबी से तंग आ चुकी थी।
सुदामा नंगे पांव श्री कृष्ण से मिलने के लिए पड़ता है, श्री कृष्ण को जैसे ही सुदामा के आने का समाचार मिलता है, वह भी नंगे पाँव सुदामा को मिलने के लिए दौड़ पड़ते हैं और उसे अपने गले से लगा लेते हैं। दोनों के नयनों से प्रेमाश्रु की धारा बहने लगती है। श्री कृष्ण ने सुदामा की बहुत सेवा करते हैं और सुदामा को बताये बिना सब कुछ प्रदान कर देते हैं । जब सुदामा घर पहुंचाता है तो अपनी झोपड़ी की जगह द्वारिका नगरी जैसा महल देखता है तो अपने मित्र श्री कृष्ण का मन ही मन कोटि कोटि धन्यवाद करता है। मेरा मित्र कितना महान है जिसने एहसान जताये बिना मेरे लिए सब कुछ कर दिया।
अध्यापक से पूछने लगे, श्री मान, श्री कृष्ण ने सुदामा को क्यों नहीं बताया कि वह उनकी मदद कर रहे हैं । अध्यापक, बेटा सच्चा मित्र कभी एहसान नही जताता है हमेशा स्नेह बश मित्र की सहायता करता है।
अरूण और गौरव को सच्ची मित्रता का अर्थ समझ आ गया ।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू कश्मीर ,जम्मू
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें