शीर्षक- नारी तेरे रूप अनेक
# विधा - छंदमुक्त कविता
नारी तेरे रूप अनेक,
अगणित तेरी कुर्बानियां।
बेटी के रूप में मान है बढ़ाती,
मायके के सम्मान के लिए,
अनेकों दुख सह जाती।
बहन है तूं भाई की,
राखी तक सीमित नहीं रह जाती,
भाई की रक्षा के लिए हर जोखिम है उठाती।
पति का हर मुश्किल में साथ निभाती है ,
अर्धांगिनी कहलाने का सम्मान तब ही पाती है।
जगत जननी तूं पालिका,
हर परिस्थिति में बच्चों के लिए लड़ जाती ।
तेरी स्तुति करने लगे,
बन जाएंगे ग्रंथ अपार,
मेरी जिहवा एक है,
तेरे परोपकार कई हज़ार।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू कश्मीर, जम्मू
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