कविता - पथ संवारती हूं दिन रात
पथ संवारती हूं दिन रात
मुझे मिलो रघुनाथ
फूलों से सजाया पथ
हृदय में बसाया राम अकथ
छोटी जाति न कोई ध्यान
हृदय बस गए प्रभु श्री राम
मीठे मीठे बेर खिलाऊं
प्रेम प्रीत के गीत सुनाऊं
राम राम जप हुई निहाल
द्वार आए अयोध्यानाथ
देखत दरस दिव्य दृष्टि पाई
सब ओर दिखे एक रघुराई
मीठे मीठे बेर का लगाया भोग
मिट गए सारे मन के रोग
जात पात का भेद मिटाया
जूठे बेर से रघुपति रिझाया
प्रेम भक्ति पूरा फल पाया
जगत स्वामी मेरे घर आया।
अमरजीत सिंह
जम्मू एवं कश्मीर, जम्मू
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भकि्तपूर्ण रचना
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