" दया धर्म धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान तुलसी दया न छोडिये जब तक घट में प्राण।" (गोस्वामी तुलसीदास जी)
गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस दोहे में दया की भावना को सर्वोपरि माना है। दया को धर्म का मूल बताया है उनके अनुसार जिस मनुष्य में दया की भावना है वहीं मनुष्य असल में धर्मी है। अभिमान पाप का मूल है जो हमें नरक की ओर ले जाता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि जब तक मनुष्य के शरीर में प्राण है तब तक उसे दया की भावना का त्याग नहीं करना चाहिए।
दया को धर्म की नींव, मूल, आधारशिला कहा जाता है। इसके बिना किए गए सब कर्म काण्ड व्यर्थ है । दया की भावना दीन, दुखी, असहाय, गरीब के लिए मरहम का कार्य करती है । अगर हमारे अंतर्मन में दीन, दुखी, असहाय के लिए करूणा और सहानुभूति नहीं उपजती तो हमें समझ लेना चाहिए कि हम बेशक शारीरिक तौर पर जीवित है लेकिन हमारी आत्मा मर चुकी है।
दया की भावना मनुष्य को मानवता के ऊंच शिखर तक ले जाती है। जिससे उसको हर एक जीव में ईश्वर की ज्योति नजर आती है वे किसी से भेद भाव नहीं करता है। पशु पक्षियों के प्रति दया की भावना दर्शानी चाहिए। उन्हें अपने आनंद विनोद और स्वाद चेष्टा के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। दया के बिना मानव जीवन पशु तूल्य है।
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