विधा- गद्य (संस्मरण)
शीर्षक - मजबूरी
हृदय की गहराई में घुस गई कई बातें कभी नहीं भूलती है ।२००२ की बात मैं और मेरा मित्र एक दिन बाबे वाली माता के मंदिर गए हुए थे। हम दोनों वहां झूलों का आनंद ले रहे थे, तभी वहां एक गरीब औरत हमसे पैसे मांगने लगी। अरूण मुझसे कहने लगा अरे तुम बहुत जल्दी दयावान हो जाते हो। अपना बटुआ जेब में रखो बूढ़ी औरत की ओर देखकर कहने लगा यह लोग मुफ्त की खाना जानते हैं मेहनत करना इनको आता ही नहीं है। वहां खड़ा एक आदमी हमारी बातें सुन रहा था उसने मुझे कहा साहिब यह औरत बहुत मजबूर हैं इसके पति की मृत्यु हो गई और बेटों ने इसको घर से बाहर निकाल दिया। अपने पेट भरने के लिए लोगों से भीख मांगती है।
अब अरूण को अपनी कही बातों पर पछतावा होने लगे और उसने अपनी जेब से कुछ पैसे उस बुजुर्ग महिला को दे दिए। मैंने कुछ खाने का सामान खरीद कर दिया।मेरे मन यही विचार आता है कि मां बाप चार पांच बच्चों को अकेले ही पाल लेते हैं फिर वो ही बच्चे अकेले मां बाप की सेवा क्यों नहीं कर पाते हैं और मां बाप को ठोकरें खाने के छोड़ देते हैं।यह १८ साल पहले की बात जब भी मुझे याद आती है तो मेरी आंखों से आंसू निकलना शुरू हो जाते हैं।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू एवं कश्मीर, जम्मू
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