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शुक्रवार, 9 मई 2025

तबाही

 शीर्षक - तबाही 

तबाही का मंजर हर ओर छाया ,

मनुष्य तूने क्यों अपने कर्ता को भुलाया ।

अपनी करनी दंड का तूने पाया, 

अब क्यों तूं है घबराया ।

चारों ओर अज्ञान का  अंधकार  बढ़ाया ,

सब को माया ने भरमाया। 

पदार्थ देख मन ललचाया 

नेकी बदी में अंतर कर नहीं पाया।

लोभ लालच में अपना नाश करवाया  ,

मन को कभी नहीं समझाया,

अंतिम अवसर भी ऐसे गंवाया

अब मन  बहुत पछताया ।


स्वरचित एवं मौलिक 

अमरजीत सिंह 

जिला सांबा ,जम्मू-कश्मीर 




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