शीर्षक - तबाही
तबाही का मंजर हर ओर छाया ,
मनुष्य तूने क्यों अपने कर्ता को भुलाया ।
अपनी करनी दंड का तूने पाया,
अब क्यों तूं है घबराया ।
चारों ओर अज्ञान का अंधकार बढ़ाया ,
सब को माया ने भरमाया।
पदार्थ देख मन ललचाया
नेकी बदी में अंतर कर नहीं पाया।
लोभ लालच में अपना नाश करवाया ,
मन को कभी नहीं समझाया,
अंतिम अवसर भी ऐसे गंवाया
अब मन बहुत पछताया ।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जिला सांबा ,जम्मू-कश्मीर
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