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शनिवार, 12 अप्रैल 2025

मन बहुत नाचत फिरता

 मन बहुत नाचा फिरता ,

बन माया का चेला ।

हवा महल बनाता आता , 

भूल जाता जग है चार दिन का मेला ।

धन दौलत संचय करता जाता ,

 एक दिन हंस उड़ जाएगा अकेला।

सब से कड़वे बोल बोलता ,

बनता जा रहा करेला ।

जिसकी खातिर सब से उलझता फिरता , 

चौरासी लाख योनि बार- बार फिरेला। 


स्वरचित एवं मौलिक 

अमरजीत सिंह

सांबा , जम्मू-कश्मीर 



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