मन बहुत नाचा फिरता ,
बन माया का चेला ।
हवा महल बनाता आता ,
भूल जाता जग है चार दिन का मेला ।
धन दौलत संचय करता जाता ,
एक दिन हंस उड़ जाएगा अकेला।
सब से कड़वे बोल बोलता ,
बनता जा रहा करेला ।
जिसकी खातिर सब से उलझता फिरता ,
चौरासी लाख योनि बार- बार फिरेला।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
सांबा , जम्मू-कश्मीर
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