शीर्षक- पथिक
पथिक का गिरना स्वाभाविक है
क्योंकि जो चलता है वही गिरता है
जो चलता नहीं वो गिरता नहीं
जीवन के इस पथ पर तेरा चलना बहुत जरूरी है
नहीं तो कैसे सीख पाएगा गिरकर उठना
जीवन के पथ पर निरंतर चलते जाना है
रास्तों की मुश्किलों को बुलंद हौंसले से आसान बनाना है।
पथिक का निरंतर चल पाना कोई आसान काम नहीं
पर उसका कठिनाइयों को देख कर रुक जाना
पीछे की ओर पैर खिसकाना
मन में निराशा के भाव लाना
छोटी- छोटी बात पर घबरा जाना
पथिक का यह काम नही ।
पथिक तेरा निरंतर आगे बढ़ना बहुत जरूरी है
मंजिल पाने के लिए मुश्किलों का सामना करना तेरी मजदूरी है
रूककर भी क्या पा लेगा तूं
जीवन के दर्पण में उतरने के लिए संघर्ष बहुत जरूरी है
बिना संघर्ष के सभी आशाएं रहती अधूरी है ।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
सांबा, जम्मू-कश्मीर
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