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रविवार, 13 अप्रैल 2025

मनुष्य मनुष्य को पहचानना भूल गया

 मनुष्य मनुष्य को पहचानना भूल गया 

धन दौलत संचय करने के चक्कर में

कर्मों की दलदल में धसकर 

लालच की भूख बढ़ाकर 

संस्कारों को तिलांजलि लगाकर

अच्छाई को दूर भगाकर 

पाखंड की चादर ओढ़ाकर 

दूसरों को बुरा बनाकर 

खुदगर्जी में डूबकर 

कर्मो के फल को भूलकर 


स्वरचित एवं मौलिक 

अमरजीत सिंह 

सांबा , जम्मू-कश्मीर 


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