मनुष्य मनुष्य को पहचानना भूल गया
धन दौलत संचय करने के चक्कर में
कर्मों की दलदल में धसकर
लालच की भूख बढ़ाकर
संस्कारों को तिलांजलि लगाकर
अच्छाई को दूर भगाकर
पाखंड की चादर ओढ़ाकर
दूसरों को बुरा बनाकर
खुदगर्जी में डूबकर
कर्मो के फल को भूलकर
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
सांबा , जम्मू-कश्मीर
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