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मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

मैं टूटने नहीं दूंगा अपने विश्वास की डोर को

 शीर्षक - मैं टूटने नहीं दूंगा अपने विश्वास की डोर को

मैं टूटने नहीं दूंगा अपने विश्वास की डोर को

चाहे कितना ही प्रचंड तूफान हो 

अंबर को अपनी ऊंचाइयों का मान हो 

बाढ़ बनकर सब बहा ले जाऊँगा 

विघ्न बाधाएं के अभिमान को ।।

सपने मेरे अब और ऊंचाई को छूने को तैयार हो 

चाहे मुश्किलें रास्ते रोकने को तैयार हो 

आत्मविश्वास से तोड़ दूँगा 

पत्थर के मजबूत होने के मान को ।।

अब कदम आगे बढ़ने को तैयार हो 

चाहे नींद चैन तेरा हराम हो 

हार जीत का फैसला मालिक पर छोड़कर 

तूं अपना कर्म करने को तैयार हो।।


स्वरचित एवं मौलिक 

अमरजीत सिंह 

सांबा ,जम्मू-कश्मीर 







 

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