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शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

कश्ती

कश्ती मेरे जीवन की, फंस गई बीच मझधार ।

अच्छा हूँ या बुरा हूँ , तूँ ही मुझे अब तार ।

अवगुणों पापों से भरा पडा, मेरा किरदार 

तेरे सहारे मेरी कश्ती, लगा दे अब भवसागर से पार।

स्वरचित एवं मौलिक 

अमरजीत सिंह 

सांबा- जम्मू-कश्मीर 



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