कश्ती मेरे जीवन की, फंस गई बीच मझधार ।
अच्छा हूँ या बुरा हूँ , तूँ ही मुझे अब तार ।
अवगुणों पापों से भरा पडा, मेरा किरदार
तेरे सहारे मेरी कश्ती, लगा दे अब भवसागर से पार।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
सांबा- जम्मू-कश्मीर
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