शीर्षक - मेरे मन की वेदना
मेरे मन की वेदना का अब करो अंत
क्यों रूठे हो मेरे प्यारे स्वामी बेअंत
तेरी चरण शरण मेरा उद्धार
द्वार पड़े को तार या मार
तेरी आरती गाता सृष्टि का कण कण
अपनी सेवा में लगा लो मेरा मन तन
निज घर में बिठा दो मेरा मन
तेरा नाम सिमरन ही सच्चा धन
मोह माया का सब झमेला
यह जग जीवन सिर्फ चार दिन का मेला
अंत में जाएगा हे हंस अकेला
बिना सतगुरु के नहीं होगा प्रभु से मेला
बिना सतगुरु कौन भरेगा मेरी हामी
शरण में अभी से जाओ सतगुरु स्वामी
इस जग में केवल सतगुरु ही तारणहार स्वामी
उसकी ओट पकड़ लो प्राणी कभी न होगी तुम्हारी हानि।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जिला - सांबा, जम्मू कश्मीर
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