नमन मंच
शीर्षक - मैं अवगुणों भरी नदी में डूबता चला जा रहूं
मैं अवगुणों भरी नदी में डूबता चला जा रहा हूं
संसार के चकाचौंध के वश में अपनी हस्ती भुलाता जा रहा हूं
मैं अवगुणों भरी नदी में डूबता चला जा रहूं...........
संसार में आने का मैंने मकसद भूला दिया
शरीर रचने वाला उस ईश्वर का परोपकार बिसार दिया
मैं अवगुणों भरी नदी में डूबता चला जा रहूं...........
मोह माया की दलदल में मैं धंसता चला गया
बाहर निकालने का राह मन से भुला दिया
मैं अवगुणों भरी नदी में डूबता चला जा रहूं..............
नेकी अच्छाई से नाता मैंने रखा न कोई
बेईमानी, खुदगर्जी को अपना स्वभाव बना लिया
मैं अवगुणों भरी नदी में डूबता चला जा रहूं............
दोषों को दूसरे में देखने का आंखों पर चश्मा लगा लिया
अपने आप को अच्छा दिखाने के लिए भक्ति को भी पाखंड बना दिया
मैं अवगुणों भरी नदी में डूबता चला जा रहूं...........
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जिला: सांबा, जम्मू कश्मीर
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