शीर्षक - निज स्वार्थ में नेता लोग
धर्म हो रहा आलोप,
निज स्वार्थ में नेता लोग,
विकास के लिए मांगा वोट,
अपने घर में भर लिए नोट,
धर्म के नाम पर लड़ा रहे हैं,
अपना वोट बना रहे हैं,
हिंदू, मुस्लिम,सिख, ईसाई को आपस में तोड़ रहे हैं,
अपने लिए धन जोड़ रहे हैं,
जनता सारी रो रही है,
भूखें ही सो रही है,
करोड़ों रुपए का करती है सरकार ऐलान,
खा जाते ये सारे शैतान,
देश को कैसे इनसे बचाएं,
देश में नया स्वराज लाएं,
वोट के लिए होती लड़ाई ,
आपस में लड़ते भाई भाई,
देश भक्ति का नेता करते दिखावा,
इनके आगे जनमानस हारा,
एक एक करके सब खा लिया,
अर्थव्यवस्था को हिला दिया,
ईमानदारी का यहां कोई मोल नहीं,
झूठ की खोलता कोई पोल नहीं,
लोकतंत्र का इन नेताओं ने मजाक बनाया,
बेईमानी का पैसा विदेशों में जमा करवाया,
देश को ये लूट रहे हैं,
जनमानस का खून पी रहे हैं,
यह इन्सान नहीं नरभक्षी है,
ये जूठन खाने वाले पक्षी है,
इनका दीन नहीं ईमान नहीं,
मैं कहता हूं नेता सारे इन्सान नहीं,
देश गरीब हो रहा है,
अपना अस्तित्व खो रहा है,
गली गली में अब शोर है,
नेता सारे चोर है,
जब जन नेता देश में आएगा,
इन चोरों से पीछे छुड़ायेगा।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
सांबा,जम्मू कश्मीर
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