# नमन मंच 🙏🙏🙏
# समतावादी कलमकार साहित्य शोध संस्थान, भारत
# दिनांक - 13-15/05/2021
# दिन - बृहस्पतिवार - शनिवार
# विषय - मजदूर
# विधा - स्वैच्छिक
दिन रात मेहनत करता हूँ,
फिर भी खाने के लिए तरसता हूँ,
मेहनत का पूरा धाम नहीं मिलता,
मन की इच्छाओं को दबाकर जीता ,
सीमेंट से हाथ पैर फट जाते,
एक गज भी चल नहीं पाता,
असहाय होकर सारा जीवन बिताता,
अपने बच्चों का भविष्य बना नहीं पाता ,
बड़े बड़े महलों को मै बनाता हूँ,
अपने लिए झोपड़ी भी नहीं बना पाता,
मजदूर हूँ मजबूर बना दिया,
मेरी मेहनत का पैसा ,
बडे़ बड़े ठेकेदारों ने खा लिया।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू, जम्मू कश्मीर
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