#विषय - अरमानों का गुबार
# विधा - कविता
किसान बीज बीजता,
प्रेम जल से, उसे सींचता ,
अरमान जागते है ,उस के मन में,
ठंडी हवा मानूँगा मैं,
ठंडी छाया में बैठूँगा मैं,
कीकर का पेड़ उग आया,
सारे अरमानों को धूल में मिलाया,
माँ बाप बच्चों को नाज से पालते,
अपना सारा प्यार धन लूटाते,
बड़े होने पर बच्चे मुंह फेर जाते,
माँ बाप के अरमानों को धूल में मिलाते,
माँ बाप के अरमानों की कदर न करते,
जिंदगी में सुख वो भी नहीं पाते ।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू, जम्मू कश्मीर
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