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शनिवार, 17 अप्रैल 2021

माता वैष्णो देवी


# विषय - माता वैष्णो देवी

# विधा - कथा 

श्रीधर माता वैष्णो देवी के अनन्य भक्त थे। एक बार भक्त जी ने घर पर कन्या पूजन किया ,उन कन्याओं में एक दिव्य कन्या थी, जिस का मुखमंडल सूर्य के समान चमक रहा था । पूजन के बाद बाकी कन्या घर लौट गई, लेकिन दिव्य कन्या वही खडी़ थी। उसने श्रीधर से कहा तुम अपने घर पर माता के भंडारे का आयोजन करो ,श्रीधर सोच में पड़ गया और कहने लगा दिव्य कन्या मैं इतने सारे लोगों को खाना कैसे खिला सकता हूँ ,मेरे घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है । दिव्य कन्या बोली भक्त जी आप सिर्फ न्यौता दो ,बाकी सब माता रानी पर छोड़ दो वो स्वयं आपका कारज संवार देगी । 

श्रीधर जी ने कन्या के कहने पर सब को भंडारे का न्यौता दे दिया । सभी लोग श्रीधर के घर भोजन ग्रहण करने के लिए आने लगे, दिव्य कन्या भी आ गई। वो सबको भोजन परोसने लगी इन भोजन ग्रहण करने वालों गुरु गोरखनाथ का शिष्य भैरवनाथ भी था । वो दिव्य कन्या से मांस मदिरा की मांग करने लगा ,दिव्य कन्या ने उसे समझाया कि यह बाह्यण के घर का भंडारा है यहाँ केवल वैष्णो भोजन ही मिलेगा। भैरवनाथ ने दिव्य कन्या का हाथ पकडना चाहा ,वो पवन रूप धारण कर त्रिकुटपर्वत की ओर चली गई । भैरवनाथ भी दिव्य कन्या को पकड़ने के लिए उसके पीछे भागने लगा। 

माता वैष्णो देवी ने ही दिव्य कन्या का रूप किया हुआ था । माता की सहायता के लिए अभी हनुमान जी भी उनके साथ थे। जब हनुमान जी की प्यास बुझाने के लिए माता ने बाण मारकर पानी निकाला उस स्थान को बाणगंगा के नाम से पुकारा जाने लगा । वहाँ माता का सुंदर मंदिर भी बनाया गया  ।

भैरवनाथ ने माता का पीछा नहीं छोड़ा वो माता के पीछे यहाँ भी पहुँच गया । माता ने यहाँ मुड़कर भैरवनाथ को देखा वहाँ माता के चरणों के चिन्ह आज भी है वो स्थान चरणपादुका के नाम से पूजे जाते है। माता ने यहाँ नौ महीने गुफा मे रहकर आराम किया वो स्थान गर्भजून के नाम से जाना जाता है। 

भैरवनाथ नाथ माता के पीछे पीछे भागता दिव्य गुफा के पास पहुंच गया। वहाँ एक तपस्वी ने उसे समझाया जिस कन्या के पीछे तुम भाग रहे वो कोई साधारण कन्या नहीं ,वो आदिशक्ति माता दुर्गा है। वो जबरदस्ती गुफा में घुसने प्रयत्न लगे, हनुमान जी और भैरवनाथ में युद्ध आरंभ हो गया । माता को बहुत क्रोध आ गया । माता ने कालिका का  रूप धारण करके भैरवनाथ का सिर धड़ से अलग कर दिया । 

धड़ से शीश अलग होने पर भैरवनाथ के शीश में जान बाकी थी। वह अपनी गलतियों के लिए माता से क्षमा मांगने लगा, उसकी विनम्र विनती सुनकर  माता रानी को उस पर दया आ गई ,और माता ने उसे वरदान दिया जो भी भक्त मेरे दर्शन करने के बाद तुम्हारा दर्शन करेंगे तभी उसकी यात्रा सफल होगी । 

उसी गुफा में माता महालक्ष्मी महाकाली और महासरस्वती की पिण्डी के रूप में अंतर्धान हो गई। 

स्वरचित एवं मौलिक

अमरजीत सिंह

जम्मू, जम्मू कश्मीर





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