#साहित्य_संगम_संस्थान_महाराष्ट्र_इकाई
#दिनांक:२३/२/२०२१
# विषय - पनघट
# विधा - कविता
पनघट की लंबी है दूरी
पानी वहाँ से भरना है मजबूरी
कमर लचकती कदम आगे बढती
आगे पीछे का भी होश है रखती
हरे भरे पेड़ों को निहारती
फूलों की भीनी भीनी खुशबू लेती
पहुँच गई है पनघट के पास में
गगरिया सिर से उतार
रूप अपना देख रही
बड़े ही चाव से
पानी भर गगरिया में
लौट चली घर ग्राम में।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू कश्मीर ,जम्मू
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