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रविवार, 14 फ़रवरी 2021

हार नहीं मानता हूं

 दिनांक - १४/०२/२०२१

 विधा - पद्य (कविता)

शीर्षक - हार नहीं मानता हूं 

हार नहीं मानता हूं

यही मेरा कर्म है

जीत कर ही जाऊंगा

बनाया अपना धर्म है

रुकता नहीं, झुकता नहीं

विघ्न, बाधाओं को हटाकर 

हमेशा रहता हूं प्रयासरत 

सुख दुख की परवाह नहीं

आत्मविश्वास मेरा अथाह है

रास्ते के रोडों को जाता हूं तोड़ता

लक्ष्य को पाने के लिए सदा रहता हूं दौड़ता

आराम को हाराम मानता हूं

मंजिल को पाना अपनी साधना मानता हूं

सफलता पाने के लिए झेलनी पड़ती है मुसीबतें हज़ार

लक्ष्य पूर्ण होने पर मिलती है खुशियां अपार।


स्वरचित एवं मौलिक

अमरजीत सिंह

जम्मू-कश्मीर, जम्मू


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