शीर्षक - नसीहत
हे इंसान कुदरत की नसीहत को मान,
नहीं तो मिट्टी में मिल जाएगा तेरा झूठा गुमान ।
अपनी मनमानी करना बंद कर,
कुदरत के कहर से नित डर ।
तेरी चतुराइयां तुझे विनाश के पथ पर ले जाएगी,
तुझे कुदरत का विकराल रूप दिखाएगी।
कुदरत का कण कण नसीहत देता नज़र आता,
हे इंसान क्यों मदमस्त होकर अपना विनाश निकट बुलाता ।
हे इंसान कुदरत ने तुझे माँ की तरह पाला,
खोल अपनी अक्ल का ताला।
कुदरत की खूबसूरती को हमेशा बरकरार रख,
तू कुदरत के कण कण से दिल से प्यार कर ।
कुदरत तुझे माँ की तरह समझाती है,
तेरी गलती का एहसास तुझे नित्य कराती है ।
कुदरत की नसीहत को जीवन के क्षण क्षण में विचार,
तभी तुझे समझ आएगा तूने नित्य किया कुदरत से खिलवाड़।
स्वरचित एवंं मौलिक
अमरजीत सिंह
सांबा, जम्मू कश्मीर
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