दिनांक - १६/०२/२०२१
विधा - पद्य
शीर्षक - प्रेम का प्याला
प्रेम का प्याला करे मतवाला
मैं मेरी के मिटे जंजाला
मन में बस गया राम नाम
भूल गया दुनिया के सब काम
भूल गया जात-पात का मान
मन कर बैठा विश्राम
अब अच्छी लगती हैं भक्तों के चरणों की धूल
अब पहचान लिया है मैंने अपना मूल
प्रेम प्याला मस्ती का है जाम
ले जाता है सीधे प्रभु के धाम
विषय विकारों से नाता दिया है तोड़ा
प्रिय प्रीतम से संबंध लिया है जोड़ा
प्रीतम के प्रेम का चढ़ गया रंग
प्रेम रस से भर गए सब अंग।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू-कश्मीर, जम्मू
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