शीर्षक-नर हो, ना निराश करो मन को
# विधा - स्वैच्छिक (छंदमुक्त कविता)
नर हो, ना निराश करो मन को,
हमेशा तुम आगे बढ़ते रहो ,
वीर की तरह ।
निराशा कभी रोक सकती नहीं,
जिसने कदम बढ़ा लिया ,
मुश्किल राहों की ओर अपना रास्ता बना लिया।
युद्ध लड़ा जाता है हौसलों से,
हथियार सिर्फ साधन है ।
नदी आगे बढ़ने के लिए,
मार्ग स्वयं बनाती,
तभी तो अपने लक्ष्य को पाती।
स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह
जम्मू कश्मीर ,जम्मू
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