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मंगलवार, 9 मार्च 2021

नर हो, ना निराश करो मन को

शीर्षक-नर हो, ना निराश करो मन को

# विधा - स्वैच्छिक (छंदमुक्त कविता) 

नर हो, ना निराश करो मन को, 

हमेशा तुम आगे बढ़ते रहो ,

वीर की तरह । 

निराशा कभी रोक सकती नहीं, 

जिसने कदम बढ़ा लिया ,

मुश्किल राहों की ओर अपना रास्ता बना लिया। 

युद्ध लड़ा जाता है हौसलों से, 

हथियार सिर्फ साधन  है । 

नदी आगे बढ़ने के लिए, 

मार्ग स्वयं बनाती, 

तभी तो अपने लक्ष्य को पाती। 


स्वरचित एवं मौलिक

 अमरजीत सिंह

 जम्मू कश्मीर ,जम्मू




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