फ़ॉलोअर

सोमवार, 25 जनवरी 2021

सिमरन करना क्यों जरूरी है ?

#विषय- सिमरन/जप

#विधा - आलेख

" दुःख में सिमरन सब करे सुख में करै न कोय
  जो सुख में सिमरन करे दुःख काहे को होय।" 
                                  भक्त कबीरदासजी

सिमरन का शाब्दिक अर्थ है याद करना। हमें किसी चीज को याद रखने के लिए उस चीज को दोहराना पड़ता है दोहराने की इस क्रिया को ही सिमरन कहा जाता है। परमपिता परमेश्वर को याद करने के लिए जिस शब्द का हम अभ्यास करते हैं इस क्रिया को सिमरन या स्मरण कहा जाता है।
परमपिता परमात्मा का सिमरन करने से हमारी आत्मा पवित्र और पावन होती है और परमेश्वर का साक्षात्कार प्राप्त करते है।सिख धर्म के पांचवें सद्गुरू श्री गुरु अर्जन देव जी महाराज अपनी पावन पवित्र वाणी में कहते हैं -
" प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा।"
उन्होंने अपनी पावन पवित्र वाणी में सिमरन को सब कर्म काण्डों से श्रेष्ठ माना है।प्रभु सिमरन से हमारे अंतर्मन की मैल धुल जाती है। प्रभु के नाम का सिमरन हमें आठों पहर करना चाहिए लेकिन जब हम प्रातः काल ब्रहम मुहूर्त में सिमरन करेंगे तो हमें काफी शांति मिलेगी ‌। सिमरन द्वारा हमें सृष्टि के बहुत सारे भेदों का ज्ञान प्राप्त होता है। हमें अपने जीवन का ज्ञान प्राप्त होगा कि हम किस उद्देश्य के लिए इस संसार में आए हैं ईश्वर ने हमें धरती पर किस कार्य को पूरा करने के लिए भेजा है।
सिमरन के द्वारा हमें अपने गुणों अवगुणों का ज्ञान प्राप्त होता है।जब हम सिमरन में बैठेंगे तो हमारे अच्छे या बुरे कार्य हमारी आंखों के सामने आ जाएंगेे। इस से हमारा अंतर्मन पवित्र और पावन होता है। सिमरन करना बहुत जरूरी है इसके बिना हम ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। हमारे संतों,महापुरुषों, अवतारों ने अपनी पावन पवित्र वाणियों हमें सिमरन वाला जीवन जीने का उपदेश दिया है।
मानव जीवन मात्र एक उद्देश्य है प्रभु नाम का सिमरन करना। गुरु अर्जुन देव जी महाराज कहते हैं कि मनुष्य को यह देही सिर्फ ईश्वर से मिलने के लिए मिली है अगर हम इस संसार में अनेक कार्य भी कर लें वो हमारे किसी काम नहीं आयेंगे। हमें करना क्या है हमें साधुसंगति में बैठकर ईश्वर का नाम स्मरण करना। सिमरन के द्वारा ही हम अनहद नाद को सुन सकते है जो निरंतर हमारे अंतर में गूंज रहा  है और इस नाद में सुरति जोड़ना हमारा मनुष्य जन्म का लक्ष्य है। वे कहते हैं - 
" भई परापति मानुख देहुरीआ।
गोविंद मिलण की इह तेरी बरीआ।
अवरि काज तेरै कितै न काम।
मिलु साध संगति भजु केवल नाम।
                   ( आसा महला ५) 

स्वरचित एवं मौलिक
अमरजीत सिंह 
जम्मू-कश्मीर, जम्मू







1 टिप्पणी:

Ritu asooja rishikesh ने कहा…

गहन ज्ञानवर्धक लेख

प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है

 शीर्षक: प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है प्रेम ही ईश्वर है ईश्वर ही प्रेम है सभी ग्रंथों का सार  सभी एक है परिवार  बना ले इसको जीवन का आ...