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बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

सिमटते परिवार

 नमन मंच 

#साहित्य संगम संस्थान राजस्थान इकाई 

#विषय - सिमटते परिवार 

विधा- कविता 

दिनांक - 24/02/2021

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एकांत बन गया अब जीवन का  अंग

कोई नहीं रहना चाहता किसी के संग

मन मर्जी के सभी बनते है मालिक

बात करने का सभी करते हैं आलस

बड़े परिवार की बड़ी है बात

हर कोई कहता मन की बात

बड़े बूढ़ों की सीख प्यारी

हल होती मुश्किलें सारी

चाचा चाची का मिलता प्यार

सब मिलकर खाते दाल

दुख सुख  के सब बनते साथी 

बनती नहीं कोई भ्रांति

दादा दादी का मिलता है प्यार दुलार

खुशी से भरा लगता है संसार

अकेले रहने से बढ़ती है परेशानी

मिलकर बांटो दुखों की कहानी

दुख की घड़ी में कोई होता नहीं साथ

पड़ती है जब समय की लात

कामकाज में सब रहते हैं व्यस्त 

बन जाते हैं मतलब परस्त

संस्कारों की हो जाती कमी

खुशी की जगह लेती है गमी

सुखी होने का सिर्फ भरते है दम 

दुख छिपाने का करते हैं कर्म 

एकल परिवार की बहुत सारी है परेशानी 

भूल जाते हैं खाना दाना पानी

अकेले रहने से बढ़ता तनाव

भूल जाते हैं सारे ख्वाब

संयुक्त परिवार सुखी परिवार

बाकी सब है मन के जंजाल । 


स्वरचित एवं मौलिक

अमरजीत सिंह 

जम्मू कश्मीर जम्मू







 



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